सब संसार आपदा आवट, राखै सोग सरीक।

दया नहीं दाणै भरी से, खाली फिरैं खटीक।

बाड़ी में बेदन बधै, किरपा रा क्या ठीक।

भो सूं भोसागर तिरै, मुकत हुवै तहतीक।

दुरवासा दोषण दियो, आधेनी अमरीक।

तपत लगी तन आपरै, भाग पुरस भजनीक।

‘लालू’ गुरु मेघा गोरखतणी, लोप जाई लीक।

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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