मेछ मळन घर ओतर्‌या, बैठा खरैज ध्यान।

जाय पुकार् या मेछनै, सरै सुणाई कान।

पापी दाणू कीलियो, गुरु री संक्या मान।

किला चिणावै भरतरा, पोळ चिणावै पाखाण।

दाणू उठियो कोपकर, हस्त पलाण्यो छात।

सांझ पड़ी पैंडै बुवा, बरती मांझळ रात।

कई माता कई ऊंघता, कई ऊझड़ कई बाट।

पौ फाटी पगड़ो भयो, दीवि नगारै डाक।

सूता’क जागो देवजी, आवै दाणू साथ।

बाहर आवो हंसराजजी, द्योनी डाण जगात।

डाण्या बामण बाणियां, डाण्या साह दलाल।

म्हारो डाण कुण झालसी, इसणी कूण मजाल।

धरती भार झेलवै, कोनी भरां जगात।

चांद सूरज सासै पड़ै, ध्यां कूं बरतै रात।

सत रो दीवो भोगवां, धरम सुणावां कन।

जा दाणू घर आपणै, बचन हमारो मान।

दाणूं उठियो कोप कर, घाल्यो मुकटनै हाथ।

हंसराज जी झटक रियो, हस्त पड़्यो ढळ छात।

गुरु सरणै ‘कूंपो’ भणै, गुरांरी अबछळ जात॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सिद्ध संत कूंपोजी ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जुलाई
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