कूंपा सिंवरो कायमा, जिण आ काया उपाई।
नख सिख सिंवारिया, सिर पर पाग बणाई।
मांहि कूवा बावड़ी, मांहि बागां छिब लाई।
औ जी आयो गोळवो, करल्यो ठुकराई।
गोवळियो हद नाच रैयो, करल्यो पतस्याही।
आवैला जमदेवरा, आजिंद पकड़ चलाई।
मारै कूटै कायागढ लूंटै, पछै सै ताक जड़ाई।
झूरै मींत महेलियां, नारी नर सै भाई।
झूरै तन री इस्तरी, सब गो सुनाई।
कांध संजोबैं चौ जणा, लेज्यां बन मांहि।
बख बख जळै अंगारिया, अंग भस्म हुय जाई।
सुकरत तो साथै नहीं, कुण हर गुण गाई।
‘कूंपो’ सिंवरै सायबा, सत गुरु साच रखाई।