हिंयाळी हांसोजी परगट्या, निकळंगरै दीवाण।

माळा गुरु री मेखळी, अै साचा सै’नाण।

पकड़ी चिटली आंगळी, स्वामी आप सुजाण।

राजै जी रा हंसराजी, हुय बैठा आपाण।

राजाणी कै पांतर्‌या, हरमल बण्या अजाण।

हरमल हांसो भेळा हुवा, भरिया अथग निवाण।

हरमल पढिया पिंडतां, बांचो वेद पुराण।

बीड़ो चन्नण म्हां कनै, किस्तूरी मै’काण।

गुरु दुवारो सेंवतां, जाण गंगा रो न्हाण।

अरध देवां आदेस मनावां, पौ उगंतै भाण।

सुण खिंयां हांसो कहै, ठेगो मांड पलाण।

बगसी माळा मेखळी, स्वामी आप सुजाण।

रिण में सुरळो खेरड़ो, बै साचा सै’नाण।

माही रा मेळा मंडै, आवै खलक जिहान।

आवै देई देवता, हिन्दू मुसळमान।

हिन्दू बांचैं पोथिया, काजी पढैं कुरान।

मेळा हुयसी मन सुवां, ईंट चढै पाषाण।

रोगी आवैं रिणकता, हंसता पाछा जाय।

हंस गुरु फरमाइया, ‘कूंपै’ किया बखाण॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सिद्ध संत कूंपोजी ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जुलाई
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