गैरो फूल गुलाब रो, झुक झुक झोला खाय।

लालू लालच परहर्‌यो, तामस काढ्यो ताय॥

बेहड़ा लिखिया ना टळै, दीना अंट बुळाय।

खांडी डांडी गुरु मारग दियो बताय॥

सपनै में सैंदे मिल्या, राजाणी रुघराय।

करसणनै दरसण दिया, चरणां लियो लगाय॥

राकस सूं हरि रिख कियो, रंक सूं कियो राय।

छीलर सूं सागर कियो, पक्की पाज बंधाय॥

पावस पाणी अथग जळ, स्वामी सिरजण चाव।

सील संजोवो साधवां, सुगरत चलो कमाय॥

सो धन सांचो साधवां, सो धन सांचो थाय।

तपै तुटै ताव सूं, घुणै घाइ खाय॥

आद भवानी ईसरी, मरै बूढी थाय।

आद पुरस आदू अटल, जोगी जुगां जाय॥

भोसागर भारी बवै, बेड़ी पार लंघाय।

‘लालू’ सारै बीनती, सांभळज्यो रुघराय॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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