अमाड़ी हर आप बैसैं, ज्ञान रै हूदै चड़ै।

दुरबीण रूपी देव देखैं, कूणसा भाजै लड़ै।

पाप इष्टी हुवै परलै, धरम सो’एकैं घड़ै।

चोरी जारी नर’र नारी, बिक्रमां घर ऊजड़ै।

दुराचारी साखहारी, दूजै रै सिर दोष खड़ै।

लालू सेतबंध श्रीराम सिंवरो, सर्व दुख दाता हड़ै।

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : सूर्यशंकर पारीक ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : जनवरी
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