चावा कवि-लेखक।
कुल्हाड़ी
चानणी रात
थे कांई चावो?
बस्ती रो बदळाव
लै संभाळ थारौ कविकरम
इज्जत
नेता
न्याय
भीड़तंत्र
कांईं होसी?
ठग रैया लोग
मिनख तो दीखै कठै अब