मेरे राम रसायण बूंटी, पीवत रोग गया सब तूटी।

मेरे राम रसायण बूंटी, पीवत रोग गया सब तूटी॥

मुख तै भ्रम गया सब भागी, कंठ में विषै-वासना त्यागी॥

हिरदा मांहि किया परकासा, मनवा मूवा हुवा निज दासा॥

नाभ-कमल में आण समाये, पांच सरपणी पकड़ मराये॥

उलटा चढ्या पिछम की वाटी, कलह कलपना ले भुय दाटी॥

सूरा संत मेरु में मंडिया, ढाया काल करम सब छडिया॥

चढ़ आकासां त्रुगटी न्हाया, सांसा सोग’रु रोग गमाया॥

त्रिगुण ताप मोह दुख गळिया, काम क्रोध सहजा पर जळिया॥

नव तत पांच पचीसूं मूवा, रामदास पी निरभै हूवा॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद' , हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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