समज मन सील सदा सुखदाई।

सील बिनां सिधाई॥

समज मन सील सदा सुखदाई।

सील बिनां सिधाई॥

धुर तें सील फरस धर धार्‌यो‌‌, विसय विकार विहाई।

क्षत्रिय मार अवनि निक्षत्री, वार इकीस बनाई॥

हनूंमांन नें सील मई हुय, चूक दृष्टि चलाई।

गार्‌यो मान असुर को गरज्यो, जब ही लंका जराई॥

रामचंद्र नें सील राख के, कसर राखी काई।

रावन बंस खोय के राघव, विजय निसांन बजाई॥

लिछमन जती सील ब्रत लेके, सांप्रथ अंग समाई।

बरस चतुर दस बन रघुवर की, करी कठि सिवकाई॥

सील वृत्त भीषम नें साध्यो, बरनी ब्यास बड़ाई।

चूक कृष्ण ने रथी चक्र को, सील प्रताप संभाई॥

सील-प्रताप सकल ही संपट, अंग्रेजा घर आई।

एक सील बिन आर्याव्रत को, गेलां दियो गमाई॥

सील सहित सिवराज सितारे, खोस लूट धर खाई।

कै ओरंग के कटक काट के, पट्ट करी पतसाई॥

सील सवांर रूस की सेन्या, लेती फिरत लराई।

करके फते तुरक लोकन की, हिम्मत खूब हराई॥

सील सनाह सरीर सझायो, दयानन्द सुभदाई।

उसी सील नें मदत आयके, काशी बिजे कराई॥

रितुगांमी व्है सील राखियो, पुत्रोत्पत्ति फल पाई।

पति पतनी दम्पति पिय प्यारी, नवला नेह निभाई॥

कोटन ऋषी सील के कारन, परम मुक्ति जिन पाई।

उमरदांन अब सील अराधत, परहर नार पराई॥

स्रोत
  • पोथी : ऊमरदान-ग्रंथावली ,
  • सिरजक : ऊमरदान लालस ,
  • संपादक : शक्तिदान कविया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : तृतीय
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