भुरकी ले जन प्यारा रे, सोई मित्र हमारा रे।

भुरकी ले जन प्यारा रे, सोई मित्र हमारा रे॥

इन भुरकी सूं अनेक उधरिया, फेर अनंत कूं तारे रे।

सेसनाग या भुरकी लीनी, मुख हजार पुकारे रे॥

या भुरकी सनकादिक लीनी, ध्रू नारद उपदेसा रे।

ब्रह्मा विष्णु शिव पारबती, उलट मिल्या सुन देसा रे॥

या भुरकी प्रह्लादै लीनी, याही जनक सुखदेवा रे।

नामदेव इन तै हरि मोह्या, मिल्या निरंजन देवा रे॥

बालमीत के याही भुरकी, पड़वा आण खाई रे।

पूर पंचायण परगट कीनी, सबही कूं पत आई रे॥

दास कबीर या भुरकी लीनी, रामानंद ले आया रे।

गुरां सहित गुरु भाई मोह्या, सब कूं भेद बताया रे॥

या भुरकी बूढण ले आया, दादूदास खाई रे।

नानग हरीदास या लीनी, संतदास उर ला रे॥

या भुरकी करता कूं मोहे, जे कोइ उर में धारे रे।

जामण मरण रोग दोय मेटे, सबहीं काम सुधारे रे॥

राम नाम की भुरकी मेरे, सब संता कूं मोह्या रे।

जिण या भुरकी नाहिं पिछाणी, यूं ही जनम विगोया रे॥

रामदास या भुरकी लीनी, सतगुरु के परतापा रे।

सो लेवै ताही मैं डारूं, मिलै निरंजण आपा रे॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद', हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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