नाम महातम कहा कहूं, केते पतित उधारे।
तुम समरथ हो सांइयां, गज गणिका तारे॥
सुवो बैठो वृक्ष पर, एको राम उचार।
सरवण सुण मुख सूं कह्यौ, सो बैकुंठ सिधारे॥
ऐक चेलै नाम है, एकै पाप घलाया।
घाल तराजू तोलिया, हरि नाम बधाया॥
पारवती कूं सिव कह्या, अम्मर भई काया।
कवियौ इंड सूवौ भयौ, शुकदेव नाम धराया॥
अजामल ब्राह्मण हुतौ, बहु करम कमाये।
पुत्र हेत पुकारतां, सोई मोख सिधाये॥
अहिल्या गौतम धरणी थी, व्याभिचार कराये।
ऋषि श्राप सिला भई, घरणी पर वाये॥
रमता राम पधारिया, जोड़ी झटकाये।
रज लागा अहिला भई, ज्यां की जहां सिधाये॥
झीवर बहुता पतित था, बहुता जीव मराये।
चरण लगाया रामजी, वैकूंठा सिधाये॥
कीता थोरी बावरी, गनिका अरु सिंवरी।
नाम प्रताप ऊंचा भया, जन आतम उधरी॥
बहुता पतित उधारिया, जाका अंत न पारा।
रामदास की वीनती, सुण सिरजणहारा॥