म्हारै कब घरि आवै रांमजी, जाकौ प्यडं परांणौं रे।

यहु अचेत है आतमां, हरि है चतुर सुजांणौ रे॥

नख सिख साजि घड़ी रही, ऊभी देखै बाटो रे।

अरस परस सुख लीजिये, तब सुफळ होइ सब गातो रे॥

विरहणिं म्हारी आतमां, अब यहु करै पुकारो रे।

जबहीं देखौं नैंन भरि, तबहीं होइ अधारो रे॥

जीव डरै यहु काल थैं, निसदिन कंपत जाए रे।

क्यूं जीऊं हूंअेकली बेगा, प्रगटहु आए रे॥

दीन जांनि किरपा करौ, जिय की यहु अरदासि हो।

टीलौ जीव चरणां रहै, सदा तुम्हारे पासि हो॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : बृजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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