खोजइ कहा निरंजन वोरे, तेरे ही घट में तुं जो रे।

बाहिरि खोज्या कबहुं लहीजइ, अंतर खोज्यां तुरत ही पईहइ।

खोजत-खोजत सब जग मूआ, तउ ही उणका काम हुआ।

ज्युं परतखि घृत में दधिवासा, पावक काठ पाखाण निवासा।

ढूंढत-ढूंढ़त जगमग मावइ, तुही उण के हाथ आवइ।

ताकउ भेद होइ सु पावइ, भेद विना कछु गम लहावे।

ज्ञानी सो जिनहरख पिछाणइ, आपही आप निरंजन जाणे॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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