खोजइ कहा निरंजन वोरे, तेरे ही घट में तुं जो रे।
बाहिरि खोज्या कबहुं न लहीजइ, अंतर खोज्यां तुरत ही पईहइ।
खोजत-खोजत सब जग मूआ, तउ ही उणका काम न हुआ।
ज्युं परतखि घृत में दधिवासा, पावक काठ पाखाण निवासा।
ढूंढत-ढूंढ़त जगमग मावइ, तुही उण के हाथ न आवइ।
ताकउ भेद होइ सु पावइ, भेद विना कछु गम न लहावे।
ज्ञानी सो जिनहरख पिछाणइ, आपही आप निरंजन जाणे॥