भीड़ पड़ी जब साध में, सारे सब काजा।
विपत पड़्यां हरि आविया, राखी जन की लाजा॥
मिनियां आया न्याव में, दोळी अगन लगाई।
कार कढाई राम की, वाऊ आंच न आई॥
भारथ में टीटोड़ी जो, कीनी हरि कुं पुकारा।
घटा नखाई रामजी, वांका बाळ उबारा॥
चात्रग बैठो वृक्ष पर, उभै मारन ध्याये।
करुणा सुनत पधारिया, हरि लीया बचाये॥
ताता ग्राह पसारिया, गजराज बधाये।
टेर सुनत हरि आविया, वाका फंद कटाये॥
विखा में पंडव हुंता, आये दरवासा।
करुना सुनत पधारिया, पूरी जन की आसा॥