उलटौ काय मार ही पंचायण मैमंत्त।

कड़त्तळ दळाँ उपाड़ि करि कड़काय चालौ कंत्त॥

कंथड़ा झालि किरमाळ केड़ौ कराँ।

सारझड़ वरण सो सोक सैलाँ सराँ॥

कमळ अरियाँ तणा घणा झटकाँ कटै।

उजबकाँ दिसी जसवंतसी ऊलटै॥

स्रोत
  • पोथी : हालाँ झालाँ रा कुंडलिया ,
  • सिरजक : ईसरदास ,
  • संपादक : मोतीलाल मेनारिया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : द्वितीय