मान्यता री बातां करै,
छिप्यो रोग छपास।
पुरस्कार रै वास्तै
भरी पिपास सिपास॥
भरी पिपास सिपास,
खा’गो पगड़ी बेचकर।
मायड़ रोयी हांसकर,
अूत गयो (रै) केसिया॥
अूत गयो (रै) केसिया,
पड़ी कुवै में भांगड़ी।
हाथां में डांगड़ी,
मर्यो ‘किशोरो’ केसिया॥