हरिजन सोई जानिये, किन तै दावा नाहिं।
सील पकड़ सिंवरण करै, रटै एक मन माहिं।
रटै एक मन माहिं, और हिरदै नहीं धारै।
संत का सबद सभाय, पकड़ पचन कू मारै।
रामदास से संतजन, मिलै ब्रह्म के माहिं।
हरिजन सोई जानियै, किन तै दावा नाहिं॥