मान्यता री बातां करै,

छिप्यो रोग छपास।

पुरस्कार रै वास्तै

भरी पिपास सिपास॥

भरी पिपास सिपास,

खा’गो पगड़ी बेचकर।

मायड़ रोयी हांसकर,

अूत गयो (रै) केसिया॥

अूत गयो (रै) केसिया,

पड़ी कुवै में भांगड़ी।

हाथां में डांगड़ी,

मर्‌यो ‘किशोरो’ केसिया॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : केसरीकान्त शर्मा ‘केसरी’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-34
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