मूँछाँ बाय फुरूकिया रसण झबूकै दंत।

सूतौ सैलाँ धौ करै हूँ बळिहारी कंत॥

कंत बळिहार लै मनाविय कामणी।

धरै मन धू-धड़ै साथि सकळा धणी॥

पाड़ि सत्र लोहडाँ धौ करै पोढियौ।

विमळ मूँछाँ मिळै फरूकै बावियौ॥

स्रोत
  • पोथी : हालाँ झालाँ रा कुंडलिया ,
  • सिरजक : ईसरदास ,
  • संपादक : मोतीलाल मेनारिया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : द्वितीय