मीरां जनमी मेड़ते परणाई चित्तौड़।
राम भजन परताप सों सकल सिष्टी शिर मौड़।
सकल सिष्टी शिर मौड़ जगत सारै ही जानी।
आगै हुई अनेक फिर वायां ने राणी।
ज्यां री तो संग्राम कह ठीक न कोई ठौड़।
मीरां जनमी मेड़ते परणाई चित्तौड़॥