ल्यावै लोड़ि पराइयाँ नहँ दै आपणियाँह।

सखी अमीणा कंथ री उरसाँ झूँपड़ियाँह॥

लोड़ि धर वार वर पराई ल्यावणा।

आपणी न दै भड़ जिकै अध्रियामणा॥

वरण कजि अपछरा वाट जोवै खड़ी।

ज्याँ भडाँ तणी झिल्लै उरस झूँपड़ी॥

स्रोत
  • पोथी : हालाँ झालाँ रा कुंडलिया ,
  • सिरजक : ईसरदास ,
  • संपादक : मोतीलाल मेनारिया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : द्वितीय