मिनख मिनख सब सारसा जांणै लोक गिंवार।

पापी पशु समान हैं भजनीक पुरुष औतार।

भजनीक पुरुष औतार जका तो मुकति सिधासी।

पापी पड़सी नरक मार जम दुवारे खासी।

एतो फरक संग्राम कह सुण लीज्यो नर नार।

मिनख मिनख सब सारसा जांणे लोक गिंवार॥

स्रोत
  • पोथी : रामस्नेही सम्प्रदाय ,
  • सिरजक : संत संग्रामदास ,
  • संपादक : वैध केवलराम स्वामी ,
  • प्रकाशक : स्वामी केवलराम आयुर्वेद सेवा निकेतन ट्रस्ट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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