दूहा
विद्रप देस सुहावणो राजा भीव नरेस।
गढ चौरासी गंजणा सहस पच्याणव देस॥
मारू
सहस पच्याणव देस भणीजै, पांच पुत्र अेक राजा।
जिण में छठी रुकमणी कन्या, लछमी आप विराजा॥
गळी गळी में नारेळ-केळा, बाग रह्या चहुं छायी।
कुन्नणपुर की सुंदर सोभा, जलमी रुकमण बाई॥
हगमग रहै इधक चतुराई, पुरखन बाळ-गोपाळा।
लछमी मंदिर वसै सबही कै, ब्रामण किया निहाला॥
इधक-इधक सुंदर चतुराई, घोड़ा गिणत न लेखा।
कुंदणपुर-सिंणगार-ओपमा, गावै पदम विसेखा॥
नारद रो आवणो
छंद
अेक समै नारद गुसांई भवन भीसम के गये
कर जोड़ राजा भीव ठाढो–मुनी, क्यूं आवत किये?
आरती बहु भांत कीनी जोड़ कर पूजा करी
ताहि दिन राजा स भीसम आसिका मांगी खरी
रुकमणी की माय बोलै – पुत्रि! चरणां लाग री
मन-भावता वर देय नारद पूर्ण प्रगटे भाग री
सोच कर कछु हरख मन में जोड़ कर ठाढी भयी
किसन वर तो कू वरै या आसिका नारद दयी
रुकमणी वर देय नारद आप मुनि वन कू गये
ताहि दिन तें हरि मिलण के रुकमणी बहु व्रत किये
रुकमणी मन में ठयी श्री किसन वर मोकूं वरै
दास पदम की वीनती जू अंबिका हरि वर मिलै
दूहा
राव रणवास पधारिया मिली सहेली द्वार
किण री बाई डीकरी किण री राजकंवार
सखी भणै, सुण राजवी राजा भींव भुवाळ
या छै बाई रुकमणी भींव-घरां अवतार
जद राजा सांसो कियो चिंता बोत कराय
धिरक हमारो जीवणो जलम अकारथ जाय
बाई रुकमण कारणै राजा जोवै वींद
पळ-पळ देखत तन घटै नैणां नावै नींद
मारू
नैणां नींद पलक नहिं झंपै चितवत रैण विहाव
चंद्रवदन चूड़ामण कारण सुरत सांवरो आवै
असुरां में नातो मत कीज्यो बै तो है सब झूठा
मथरा मल्ल अखाड़ै जीत्या देव दुवारका दीठा
वसदेव-नंदन असुर-निकंदन तीन लोक को सांई
राजा वींद विसंभर हेर्यो चूड़ामण कै तांई
द्वारामति सूं किसन पधारै तीन लोक को राजा
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं सरै हमारा काजा
दूहा
भीसम-सुता जनम्मिया कृष्ण समर्पणियां
कहत-सुणत पातक कटै मंगळ रुकमणियां
चंद्रवदन चूड़ामणी भींव घरे अवतार
बंधू रुकमइयो भलो मंत्रि-सिरोमणि सार
ब्याव री राय
मारू
राजा भींव कंवर रुकमइयो मंत्र करेवा बैठा
इण कन्या नै जो वर जुगता सो वर किण नहिं दीठा
रुकमइयो भणै सुणो राजाजी थे तो सगळी जाणो
म्हां नै तो बाळक-बुध आवै पिछली तुमहि पिछाणो
राजा भणै, सुणो रुकमइया वर वनमाळी जाणो
छपन कोट जदुवन को राजा वंस विसुध्ध वखाणो
त्रिभुवन में, सुण लेव, सांवरै सरवर कोइ न दीठा
राजा भीव कंवर रुकमइयो मंत्र करेवा बैठा
दूहा
कंवर कनोधर यूं भणै टीकम अहड़ो जाण
गोकळ गऊ चरांवतो भलो सरायो कान्ह
मारू
व्रंद्रावन में गऊ चरावै भिड़वाळयां रै साथै
वंसी बजावै कामण मोवै जीमै उण रै हाथै
परनारी रै पल्लै झूमै मांगै दान मही को
तुम जो कहौ त्रिभुवन को राजा चोथो खंड अही को
छत्री कुळ की करो बराबर बो भिड़वाळयो जाणो
जिण का कुळ की लज्या आवै तिण कूं किसो वखाणो?
दरसण काळो, बोलै कूड़ो तन मधरो, अभिमानो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं भलो सरायो कानो
दूहा
भींव भणै, सुत माहरा थे छो मूढ़-गिंवार
बीजां रै भुज दोय छै हरजी रै भुज च्यार
मारू
चत्रभुज नै च्यारूं भुज सोहै गरुड़ासण गोविंदो
ब्रह्मादिक सनकादिक थरप्या अह-निस सूरज चंदो
वासक कै सिर धरणी थरपी जळ पाताळ चलायो
नीचै जळ कूं ऊपर ल्याया विच में मुलक वसायो
या मरजाद आप हरि बांधी हुकमां काम चलायो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं विण थंभां नभ छायो
दूहा
कंवर भणै, सुण राजवी सांभळ भींव भुवाळ
पूरब देस री नरपती वर वरसां सिसपाळ
मारू
दम्मघोस राजा रो नंदन धन रो वार न पारो
सिव-किरपा सूं लिछमी पायी सोहै राज-दवारो
भंडारी-कोठारी सोहै हसती-तुरंग अपारो
आप थकी इधको वर लीजै अड़वड़ियां आधारो
सबळां सेती सगपण कीजै पाणी पहली पाजौ
कंवर भणै, थे सुणो राजवी ग्वाळयां सूं नहिं लाजौ
दम्मघोस रो पुत्र भणीजै इसो बळी अक दानो
जिण संग चढै पिच्याणव खोहण रूड़ी बांरी जानो
जिण संग चढै निन्याणव राजा पूरब तणो नरेसा
पहली तो सब जादू जीत्या खोस लिया सब देसा
समद तणै जाय सरणै बैठो नगर वसायो मांही
भय करतो बाहर नहिं आवै मानूं मिल गयो छांही
काळजमन रै आगै भागो थां सूं किसोक छानो
पदम भणै, रुकमइयो भाखै भलो सरायो कान्हो
दूहा
भींव भणै, सुत माहरा तै कहि निपट अयान
नख पर गिरवर धारियो कुबज्या राख्यो मान
सीता री बाहर चढ्यो सायर बांधी पाज
धनस-बाण कर धार कै देव सुधारण काज
मारू
सायर पाज सही कर बांधी वानर-रींछ मिलाया
कुंभकरण-महारावण मार्या आगे असुर संताया
रावण रूप देख सीता को असुर कुबुध-बुध आयी
रावण रा दस मसतक छेद्या बंद तैंतीस छुडायी
भब्भीखण नै राजतिलक दियो कनकमाळ पहरायी
जानकी लेय अजोध्या आया घर-घर बंटी बंधाई
रघुवर हुवा अवतार निरमळा साख वेद में गायी
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं सोई अब जादूराई
दूहा
भींव भणै, सुत माहरा रुकमण नै वर सार
जेण अघासुर मारियो विरछ अमोड़्या तार
मारू
ताड़क बिरछ अमोड़्या कान्हड़ संकटासुर सिंघार्यो
नळ-कूबर दोऊं बळवता, तिण को मूळ उपाड़्यो
जमनाजळ में काळी नाथ्यो बळ अजगर को मार्यो
कंस जाय धरणी सूं चूर्यो जादव कियो उबारो
कुवळियापीड़ कुंजर कू मार्यो मुस्टिक मल्ल अखाड़ै
असुर कंस चाणूर पछाड़्या असुरां तणै पवाड़ै
अै अवतार पवाड़ा भाखा तूं मत अहड़ो जाणै
छपन कोट जदवां रो राजा जिण रो वंस बखाणै
तीन लोक अर चवदा भवन में नहीं किणीं सूं छानो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं वर वनमाळी जाणो
दूहा
कंस ज तेड़ी पूतना जहर लगायो गात
सिसु मारण आवत भयी सुण अचरज की बात
आसावरी
लाल को मुख देखणकूं आयी
रात वसी असुरां की नगरी बोत महा दुख पायी
पुरसां का मूढां नहिं देख्या अड़सठ तीरथ न्हायी
जद मैं ध्यान धर्यो बैकुंठ नै बैकुंठ खाली पायी
सुर-नर-मुनि-जन क्रोड़ देवता ले ब्रज में सब आयी
अेता बाळक देख्या ब्रज में इण में जोत सवाई
जो मैं तेरा बुरा चींतऊं अंखियां की सोगन खायी
चित सुध जाण जसोदा राणी पलणा दिया बतायी
विखला थण भर मुख में दीना सूत खैंच जदुराई
पड़ी जाय जद डोढ जोजन में असुरां संक्या खायी
पदम भणै प्रणवै पांय लागू माता की गत पायी
छंद
ब्यांव वैर अर प्रीत लायक सूं कीजिये
राज-तखत पै बैठ ग्वाळ क्यों जोइये
जात हीण कुळ हीण सभा में लजानियै
जिण सूं किसा विहाव वचन अेक मानियै
मान वचन भुवाल भीखम फेर या मत कीजियै
दमघोस को सिसपाळ राजा ताहि कन्या दीजियै
जात सूर सुजात सुंदर आदि-राजा जाणियै
ताहि कन्या देत सोभा वचन अैसा मानियै
मारू
भरी सभा में इन्द्र ज कोप्यो ब्रज सूं भेंट न आयी
या ब्रज ऊपर जळ बरसावो सब कूं देवो बहायी
आवरतक कूं आदी लेकै च्यारूं पुत्र बुलाया
वरख्यो घन गज-सूंड-धार गोवर्धन धार बचाया
राजा भींव कहै, रुकमइया किण राजा कूं दीजै
ओछै संगै सगारथ करतां मान-बड़ाई छीजै
पूरै संगे सगारथ कीजै वा-की सरण रहीजै
नन्द महर का कुंवर कन्हइया वाकू कन्या दीजै
विलंम न करो, वेग उर मांही यही वचन धर लीजै
पदमइयो तेरो जस गावै काम भलेरा कीजै
दूहा
चमक कनोधर उठ चल्यो घर जाय पूछी माय
तखत चंदेरी छांड कै नातो और कराय
मारू
नातो और करावै माता थांरै मन कांइ भावै
माखण चोर परायो खावै जिण नूं राव सरावै
गज-दळ-ठाट दळां रो पूरो तखत चंदेरी सोहै
च्यार खूंट नव खंड विचाळै अहड़ो और न को है
नेम-धरम की सब विध जाणै नगर-धरम की पाजा
सुंदर वर सिसपाळ भणीजै ताहि न झंपै राजा
रुकमइया का वचन सुणे-सुण हिवड़ा मांही साळयो
देखो मत राजा भीखम की कहड़ां नै उठ चाल्यो
माता-सुत मिल मंत्र विचार्यो दोस न लावो कोई
करो सगाई भजन कीजिये जा विध राखै सांई
रुकमइयै का वचन सुणे-सुण माता मंत्र उपायो
विप्र बुलावो लगन लिखावो चंदेरी पहुंचावो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं वेगो विप्र बुलावो
दूहा
पड़दै राणी वीनवै सुणो नरेसुर राव
अब थांरो बळ हट गयो करता कोट उपाव
मारू
करता कोट उपाव नरेसुर! विधना ओछी वाणी
राणी भणै, सुणो राजाजी म्हे थांरी मत जाणी
राणी भणै, सुणो राजाजी यही वात मन पेखो
रुकमइयो थांरी पत राखै बैठा-बैठा देखो
राणी भणै, सुणो राजाजी थांरी वात न भायी
थांनै राजा वडपण दीनो बैठा हरि-गुण गायी
अेक ज घर में दोय मता है भगति कहां तें होई
पुरख ज पूतै देवता भूत-भूतणी जोई
वांस-विड़ो अपणो कुळ जारै अैसो पुत्र तुम्हारो
पिता कहै वाकी नहिं मानै कंवर फिरै अपकारो
राजा भणै, सुणो तुम राणी यहै वात ना सोही
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं कर देखो हर कोई
आसावरी
कहा थांरै नंदनंदन मन मान्यो?
राणी अरज करै राजा सूं विरध भया, हम जाण्यो
जात-पांत कुळ वाकै नांही सो रुकमण, वर ठाण्यो
व्रंद्रावन में गऊ चरावै कांध कामर नांव कान्यो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं मोर मुगट वाको वान्यो
सोरठ
भोळी राणी बावरी हे गिरवरधारी नै परणास्यां
सठ रुकमइयो अेक न मानै कह सिसपाळ बुलास्यां
बो सिसपाळ चंदेरी रो राजा म्हे त्रिभुवन-पत ध्यास्यां
जो हरि म्हांरै भवन पधारै घर बैठा मुगती पास्यां
प्राण तजूं पिण पण नहिं छांडूं रुकमण रथ बैठास्यां
पदम स्याम जो हरि नहिं आवै तो मरस्यां विस खास्यां
दूहा
राणी सूं राजा कहै सुणो प्राण-आधार
तीन-लोक-पति कृष्ण जू वाकी है वर नार
मारू
तीन लोक रो नायक केसौ केता किया पंवाड़ा
मार्या दुस्ट दैत अर दाना अनगिन असुर पछाड़्या
बाळ-रूप हुय हंसी पूतना पहल पवाड़ा कीया
पायी सजा सिरीधर जोसी विप्र जाण जिव दीया
मल्ल अखाड़ै हसती मार्या करसूं दसन उपाड़्यो
काळी-नाग नाथ कर लाया नख पर गिरवर धार्यो
मार् या कंस केस गहि केसौ जन प्रहळाद बचायो
उग्रसेन पर किरपा कीनी राजा कर बैठायो
दूहा
भगत जाण हरि अवतर्या राजा दसरथ-धाम
परणी सीता पैज सूं धनस चढायो राम
मारू
धनस चढाय किया दोय टूका राजा सब मुख जोवै
सुर-नर-मुनि-जन रह्या अचंभै ब्रह्मा का मन मोवै
रावण का दस मसतक छेद्या दियो भभीखण राजा
परसराम छत्री वस कीया सस्त्र अवधपुर साजा
वरा-रूप हुय प्रथमी लाया जाणै सकल जिहाणा
मच्छ-रूप हुय वेद निकास्या ब्रह्मा करै बखाणा
बावन हुय प्रभु प्रथमी नापी बळि पाताळ पठायो
नरसिंघ-रूप हत्यो हिरणाकुस जन प्रहळाद बचायो
जहां-जहां भीड़ पड़ी संतन में तहां आप चल आया
पदम भणै बुध्धा अवतारी बहुता काम बणाया
ठूमरी
राजा वर हेर् यो कारो कान्हो
जाणी तुमारी बुध्धि राव व्रध, रस में विस क्यों छाणो
व्रंदावण में धेन चरावै मांगै मही को दानो
भटकत फिरै गोकुळ गळियन में कैसें राव बखाणो
अब ही तजो राव! हठ अैसो लोग हंसै घर हाणो
अरि-भय मान वस्यो सिंधू में बो म्हां सूं नहिं छानो
बो सिसपाळ चंदेरी रो राजा लाख गढां रो राणो
उण नै तजो ग्वाळ धी देतां लाज नेक उर आणो
ब्यांवण आवै चंदेरि-धरा-पत यो तुम निहचै जाणो
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं चाहैं मानो मत मानो
मारू
सुणो नरेसर वात हमारी ब्यांह तणी बुध राखो
बुरी-भली सूं रहो निराळा बोझ कंवर सिर नाखो
रुकमइयो अति मूरख राजा कही सुणी नहिं मानै
कुळ अभमान वड़ाई राखै वेद-भेद नहिं जाणैं
असुर तणां दळ ऊपर हरख्यो छाड्यो त्रिभुवन राई
पूरण ब्रह्म पदम का स्वामी जिण या सिस्टि उपाई
दूहा
कहूं बडाई कृष्ण की सुणियो राजकंवार
निबळां रो बळ राम छै निरधारां आधार
मारू
निरधारां आधारो केसव पार न पावै सेसा
तीन लोक जिण रै मुख मांही वै हरि कृष्ण नरेसा
वै हरि कृष्ण नरेस भणीजै निराकार आकारो
पदम भणै प्रणवै पाय लागू सिस्टि उपावणहारो
माता पुत्र मिल मतो उपायो रुकमण नै समझायी
बाई मानो माहरी राजा समझै नांयी
रीस भरी बाई यूं बोलै, कुळ नै काट लगायी
म्हारो वर छै कृष्ण सांवरो परणू जादव-राई
नंद महर को कंवर कन्हइयो वो भिड़वाळयो जाणो
सिसपाळा की नहीं बराबर लाख गढां को राणो
राम अवतार में आगे परणी सोइ कृष्ण अवतारो
कहै रुकमणी सुणी रुकमइया अबहि घणी मत ताणो
माता कहै सुणो री बाई कह्यो हमारो कीजै
पदम भणै प्रणवै पाय लागूं पाछो उतर न दीजै