दूहा
आकासइं ऊडी गयो, हनुमंत सेन समेत।
पहुतो गढ़ लंकापुरी, पणि रुंध्यो गढ़ तेथि॥
हनुमंत पूछ्यो केण कियो, ए ऊंचो गढ़ संच।
कहइं मंत्री राक्षस तणो, सहु माया परपंच॥
कूड़ यंत्र माहे तिसइ, असालिया मुख दिट्ठ।
दाढ विडंबित उग्र विष, अहि वेढियो अनिट्ठ॥
वज्र कवच पहरि करी, हनुमंत गयो हजूर।
कूड यंत्र प्राकार सहु, भांजि किया चकचूर॥
तस मुखमइ पइठो तुरंत, गदा हाथि हथियार।
उदर विलूरी नीसर् यो, नखना दिया प्रहार॥
आसालिया विद्यातणी, वज्रमुख सुणी पोकार।
जुद्ध करइं हनुमंत सुं, आरक्षक अहंकार॥
हनुमंते वज्रमुख मारियो, चक्र सुं छेदिउ सीस।
अधो सुंदरी सुता, आवी वापनी रीस॥
हनुमंत सुं रण मंडियो, जेहवइं नाखंइ तीर।
तेहवइ तेहनइ हाथ थी, धनुष झूंटि ल्यइं वीर॥
मोगर सकति मुंकइ वली, लंकासुंदरि जाम।
हथियार हाथ थी झूंटता, दृष्टि पड़्यो रूप ताम॥
कामातुर हनुमंत थयो, ते पणि हनुमंत देखि।
कंदर्पने बांणेकरी, वींधाणी सुविशेखि॥
लंकासुंदरी चिंतवइं, इण विण जीव्युं फोक।
कहइं जिम तइं मुझ मन मोहिउ, मइं पणि तुझ सहु थोक॥
हाथ संघातइं हाथ मुझ, हिवइ तुं झालि सुजाण।
हनुमंत लंकासुंदरी, कीधो वचन प्रमांण॥
खोलइं बइसारी करी, गाढालिंगन दिद्ध।
विद्याबलि तिण बिकुरवी, नगरी तेथि समृद्ध॥
रातइं ते साथे रही, हनुमंत चाल्यो प्रभात।
अधो लंकसुंदरि भणी, जुद्धतणी कहि बात॥
पहुतउ ते लंकापुरी, गयो विभीषण गेह।
करि प्रणाम ऊभो रह्यो, कर जोड़ी सुसनेह॥
आदर देनइं पूछियो, राय विभीषण तेह।
कहउ किण कांमइ आवीया, तब हनुमंत कहइं एह॥
रांम सुग्रीव हुं मुंकियो, प्रभो तुम्हारइं पासि।
नीति निपुण तुम्हें सांभल्यो, सुणो एक अरदास॥
रामतणी सीता रमणि, आंणी रांवण राय।
पणि पररमणी फरसता, निज कुल मइलउ थाय॥
कुण न करइं रिधि गारवउ, नारि सुं कुण न मुज्झ।
विधिना कुंण न खंडीयो, कुण चूको नहिं बुज्झ॥
जउपिणि जगत इसो अछइ, तउ पिणि जाणउ एम।
निज बांधव रावण तणी, करउ उपेक्षा केम॥
रांवण समझावी करी, पाछी मुंकउ सीत।
कहइ विभीषण मइ कही, पहिली घणी कफीत॥
तउपणि ते मांनइ नहीं, वलिहुं कहिसि विशेषि।
विसनी रांवण अति हठी, स्युं कीजइं तुं देखि॥
हनुमंत चाल्यो तिहांथकी, पहुतो सीता तीर।
दीठी सीत दयामणी, दुरबल क्षीण सरीर॥
जेहवी कमलनी हिमबली, तेहवी तनु विछाय।
आंखे आंसू नाखती, धरती दृष्टि लगाय॥
केसपास छूटइ थकइं, डावइं गाल दे हाथ।
नीसांसां मुख नाखती, दीठी दुख भर साथि॥
चौपाई
सीता हरिखीजी, निज हीयड़इ सीता हरिखीजी।
हनुमंत दीध रामना हाथनी, मुंद्रड़ी नयणे निरखीजी॥
हळुयइ हळुयइ हनुमंत जाई, सीत प्रणाम करेई।
मुंद्री खोळा मांहे नाखी, आणंद अंगि धरेई॥
मुंद्रड़ी देखि सीता मन हरखी, जाणि हुयो प्रिय संगम।
अमृतकुंडमांहे जाणे नाही, विहंस्यो तनु थयो संभ्रम॥
रतन जड़ित रंगीलो ओढणा, सीता वगिस्यउं उत्तम।
हनुमंतनइ वलि पूछइ हरखइ, कुशलखेम छइ प्रीतम॥
कहइ हनुमंत संदेसो सगळो, राम कह्यो जे रंग भरि।
सुणि सीता वलि अतिघणुं हरखी, देखि भणइ मंदोदरि॥
सुंदरि आज तुं किम हरखित थई, संतोषी मुझ प्रियुड़इ।
कोप करइ सीता कहइ कां तुं, फोकट फाटइ हियड़इ॥
हरखनो हेतु जाणि तुं ए मुझ, प्रियुनी कुशलि खेमी।
इणि सापुरस मुंद्रड़ी आंणी, आणंद तेण करेमी॥
पूछइ सीता कहि तुं कुण छइं, केहनो पुत्र तुं परकज।
कहइ हुं पवनंजय नो नंदन, अंजनासुंदरि अंगजु॥
हनुमंत माहरो नाम कहीजइ, सुग्रीवनउ हूं चाकर।
सुग्रीव पणि रामनो चाकर, राम सहूनो ठाकुर॥
तुझ विरहइ मुझ प्रियु दुख मानइं, अधिको दुखु नरगथी।
बेधक जन कहइं प्रीतम संगम, अधिको सुखु सरगथी॥
तिण कारण मुनिवर वांछइ नहीं, प्रीतम संगम कोई।
जे भणी प्रीतम विरह दुखनो, पालण पछइ न होई॥
कहइ सीता सुणि ए वात इम हीज, तउपणि विरला ते नर।
न करइं प्रेम तणो जे प्रतिबंध, पणि हुं नहिं साहसधर॥
वळि आंखे आंसू नांखती, कहइं सीता हनुमंतइं।
लखमण सहित रामचंदकहितइ, किहां दीठो मुझ कंतनइं॥
सरीर समाधि अछंइ मुझ प्रियनइ, के मुंद्रड़ी पड़ि पाई।
कहइ हनुमंत सांभळी तुं सामिणि, आरति म करे काई॥
कुशल खेम तुझ प्रीतमनइं छइ, वसइं किकिंध विशेषइं।
पणि प्रियनइ एतो छइ अकुसल, तुझ मुख कमल न देखइं॥
पणि श्रीराम कह्यो छइ इमरे, जानावुं तुझ पासइं।
तुझ सरिखा कहि सुभट किता तिहा, वलि सिता इम भासइं॥
कहइ हनुमंत मुझ माहे तउ छइ, सुभटपणो निज गेहइं।
राम समीपि जे सुभट अभंग भड़, तेह तणइ हुं छेहइ॥
इण अवसरि मंदोदरी बोली, सुणि एहनुं बळ एतळ।
रावण आगइ वरुणादिक रिपु, मारि भांज्या एकलमळ॥
ए सरीखो कोई सुभट नहीं इहां, तुष्टमांन थयो रावण।
चंद्रनखा निज भगिनी तनया, परणावी सुखपावन॥
पति अनंगकुसमानो ए नर, पणि थयो धरणीधर वर।
कहइ हनुमंत सांभळि मंदोदरी, तसु उपगार अधिकतर॥
प्रत्युपकार करण भणी सुंदरि, दूतपणउ अम्ह भूषण।
पणि तुं सीता विचि थइ दूती, ते मोटो तुझ दूषण॥
जिण कारणि कवियण कहइ एहवा, अन्य रमणि नी संगति।
अस्त्री प्रीतम नइ बांछइ नहीं, वर तजइं प्राण अहंकृत्ति॥
कोपकरी मंदोदरी कहइ किम, सुग्रीव बानर प्रमुखा।
दसमुख पंचानन सेवा तजि, रांम जुंबक भजंइ विमुखा॥
तिण कारणि तुं छोड़ि रामनइं, भजि रावण राजेसर।
सुणि हनुमंत तुं करि आतम हित, ए मुझ पति परमेसर॥
अहंकार वचन सुणि सीता कहइं, कां तुं मुझ पति निंदइ।
वज्रावरत धनुष जिण चाड्यो, जगत सहू पद वंदइ॥
रिपु गज घटा विडारण केसरि, लखमण जास सहोदर।
थोड़ा दिवसमइं तु पणि देखिसि, प्रगट रूप परमेसर॥
तुझ पति अपराधी नइं देस्यइ, मुझ पति डंड प्रबलतर।
पापी जीव भणी जिम प्रायश्चित, द्यइ गीतारथ सदगुर॥
वचन सुणी सीता ना कोपी, मंदोदरि करइ भरछन।
पापिणि माहरा पतिनै इम तुं, कां बोलइ ए कुवचन॥
यष्टि मुष्टि प्रहारै सीता, मारण मांडी पापिणी।
फिट फिट करि हनुमंत निभ्रंछी, निरपराध संतापणि॥
कहइ मंदोदरि जइ रावणनइ, हनुमंत दूत समागम।
सेना सुं हनुमंत नइ भोजन, सीता द्यइ सुमनोगम॥
आप एकांतइ वइसी सीता, राम नाम धरि हियइं।
गुणि नउकार पछइ कर भोजन, अवधि पूगी तिण लीयइं॥
हनुमंत सीता नइ इम विनवइ, बइसी खबइ मुझ स्वामिनी।
जिम श्रीराम पासिइं लेइं जाऊं, सुख भोगिवी तुं सुहागिनी॥
कहइ सीता रोती हनुमंत नइं, एह बात नहीं जुगती।
पर पुरुष सुं फरसुं नहिं किदिहुं, ऊडण की नहिं सगती॥
आप राम आवइ जो इहां किणी, तो जाउं तिण सेती।
जा हनुमंत रावण करइं उपद्रव, ढील म करि खिण जेती॥
मुझ वचने कहिजे प्रीतम नइं, पड़िलाभ्यो गुरु ग्यानी।
थयो नीरोग जटायुध पंखी, वृष्टि थई सोना नी॥
वलि देजे चूड़ामणि माहरी, सहिनाणी प्रीतम नइं।
इम कहिनइ कीधी सीख तिणसुं, हनुमंत कल्याण तुम्हनइं॥
सीता रोती नइं हनुमंत द्यइ, इम मां बीहिसि बहुपरि।
आया देखि राम नइं लखमण, इहां बइठी धीरज धरि॥
हनुमंत सीता चरण नमीनइं, चाल्यो संदेसा हारण।
रांवण केड़ि मुंकिया राक्षस, मूल थी मारण कारण॥
वन मांहे गयो हनुमंत बानर, तितरइं दीठा परदल।
विविध वृक्ष उनमूली मांड्या, गदा हाथि अतुली बल॥
रिपु दल त्रुटि पड़्या समकालइं, हनुमंत उपरि तत्क्षण।
हनुमंत रिपुदल भांजी नांख्या, वृक्ष प्रहार विचक्षण॥
वलि सहु सुभट मिलीनइं धाया, हनुमंत ऊपर असिधर।
हनुमंत हण्या गदा हथियारइ, अंधकार जिमि दिनकर॥