वस्तु
ताम असपति ताम असपति धरइ बहु कोप।
अलावदीन कहइ इस्युं सहू मीर वेगा हंकारउ।
पातसाह फुरमाण दइ वेगि वेगि कोठी भराऊं।
खान खोजा मलिकज अछइ तेइ म लाउं बार।
आलमसाह रणथंभ नइ वेगि हुवउ असवार॥
दूहा
मोडि मूंछ बोलइं इसउ, लिखउ लिखउ फुरमाण।
सहू कटक मिलि आवियो, जे मानइ म्हारी आण॥
तिणि अवसरि अलावदीन, कीध प्रतगन्या ईस।
रणथंभवर लेइ करी, तउ हूं घरि आवीसु॥
चउपइ
आलमसाह हुवइ असवार, जाणे गढ लेसी करतार।
तियरा दल नवि लाभै पार, छायो सूर हुवउ घोरधांर॥
नीसाणै घाव घण वल्या, वाजइ ढोल ति पितलि गल्या।
त्रंबक डाक बुक अति घणा, रिण काहल लागइ वाजणा॥
ढीली थकउ चाल्यु सुरताण, सेषनाग टळटळीया ताम।
डूंगर गुड़इ समुद्र झळहळइ, त्रिभुवन कोलाहल ऊछळइ॥
इंद्रासणि जाइ लागी खेह, इंद्र जोवइ तिहां न्यान धरेवि।
अलावदीन आपइ सुरताण, रणथंभरि जाई दीयउ पवाण॥
लोक कहइ कुण करसी काम, इंद्र तणउ सहु लेसी ठांम।
असी गढ अलुखान ज लीया, डीलइ साहिब कणि कोटनबिगया॥
इय आगलि नवि मांडइ कोई, माणस किसुं देव जइ होई।
रिणथंभवर तणी कुण बात, आगलि मेर न हुइ कांइसात॥
चउदह सहस माता उम्मत्ता, ते गुड़िया गयवर संजुत्ता।
पाणीपंथा भला तोषार, बार लाख मिलिया असवार॥
मुहिमद मीर मोटा पठाण, बे ऊमटी आव्या खुरसाण।
मुगल काफर ते अतिघणा, मलिक मीर मीयां नह मणा॥
सतर खान मिलिया तिणीवार, बहत्तरि ऊबरा भला झूझार।
पातसाह रा डीलज जिसा, तीयरा नाम कहुं हिव किसा॥
काफर माफर जाफरखान, खोजी मोजी रोजी नाम।
निसरतखान निकुंज निरोज, ताजखान री जमली फोज॥
जिहर मलिक बीजुलीखान, सेख सरीखा मोटा नाम।
अल्लू मल्लू चल्लू एऊ, घणा कटक स्यउं आव्या तेऊ॥
मांजी गालिम महिला खान, खूनी मुनी ज्ञानी नाम।
सिंहदल मलिक हंसबा हसेब, मालद नगदल अलख असेव॥
हाजी कालू ऊंबरा बड़ा, पाहड़ प्रेम तिहांरा धड़ा।
स्रु वलिक रुकबदीन बेऊ, ततारखान फोज मांहि तेऊ॥
अहमद महमद महवी कीया, आलफखान पछवाण ज हूवा।
कौरउपरि कीधउ मुगीस, दाफर फिरइं फेर निसदीस॥
राणो राणि हिंदु मिल्या घणा, दल आव्या देस देसह तणा।
‘भांडउ’ कहइ वर्णवउ किसउ, पातिसाह दल चक्रवर्ति जिसउ॥
काळी पाखर काळा टोप, लोह तणा ते दीसइ टोप।
घोड़े चड्या ते आइध लेउ, जाणे जम ना सेवक तेउ॥
कटक तणी गाढी संजती, पांच लाख चालइ पालखी।
राजवाहण वहिल चकडोळ, धूजी धरा पंडिउ हलोल॥
भोथी भोई भील अति घणा, सूई सूनार तणी नहिं मणा।
तंबोळीय माळीय कलाळ, नाचणि मोची नइ लोहार॥
मोची घांची नइ तेरमा, धोई .... साबणगर घणा।
सइ सेलार सेख खाटही, कादी पुराण पढइ ले वही॥
बाण्या बांभण बहुला मिल्या, बणकर सूत्रधार दलि भिल्या।
कनड़ा कुर्कट हबसी किसा, खूटी देई झूझइ तिसा॥
कोठी अनइ घणा बाजारि, त्रिणी लाख गाडा कटक मंझारि।
पोठी ऊंट गादह वेसरा, तिहरी पूठि भर्या अति भर्या॥
पाखर जरंद अनइ घणा बाजारि, त्रिणि लाख गाडा कटक मंझारि।
पोठी ऊंट गादह वेसरा, तिहरी पूठि भर्या अति भर्या॥
पाखर जरद अनइ जीण साल, जल जंत्र नालि ढीकुली झमाल।
वर्णा वर्ण कटक मांहि सहु, जं जोईय तं लाभइ बहु॥
‘भांडउ’ कहइ कटक अनमानि, सवाकोड़ि मिलिउ माणस ताम।
खुर रवि खेह छायउ आभ, भूला न लहइ बेटउ बाप॥
जोयण च्यार पड़इ मिलाण, रूंख वृख न रहइ तिणि ठाणि।
समुद्र तणी वेलू हुइ जिसी, पातिसाह फोज हुइ तिसी॥
मनि चितवइ इसु सुरताण, जात समउ भांजिसु गढ ठाम।
सभरिवाल जीवतउ ग्रहउ, सहर बंदि ले ढीली करउ॥
सवालाख माहि दीधीवाह, लूभइ बंधइ माणस आह।
ढाहइ पोलि नगर प्राकार, देश मांहि वलि फिर्या अपार॥
दूहा
पातिसाह आदेश द्यइ, सर्भलि अलुखान।
देस विणास किसउ करउ, गढि जाइ द्यउ रि मिलाण॥
द्वाही छइ रि खुदाइ की, जइरि विणासउ देस।
सींचाणा ज्यउं झड़प ल्यउ, रणथंभवर नरेस॥
चौपई
आलम साह नइ अलुखान, वेगि करि गढि आव्या ताम।
पातिसाह गढ दीठउ जिसइ, जोई द्रिष्ट विकासी तिसइ॥
सावदंलि आव्यउ सुरताण, फोज कीया मीर मलिक ने खान।
हाल हाल करइ अपार, गढ पाखलि फिरीया असवार॥
नदी तणा जिसा हुइ पूरि, कटक तणा दीसइ झलूरि।
रूद्र घणा वाजइ नीसाण, गढरा लोक पड़इ पराण॥
ढलकी ढाल फरहरी चांध, गढ पाखलि फिरीया वेढ।
धूजी धरा गढ कांपीयउ, शेषनाग तिहि साही राखीयो॥
गढ चांपी आपि सुरताण, मिलाणीरा हुवा फुरमाण।
घणा कटक अर मोटा खान, चहुं पोलि हुआ मिलाण॥
पंच वर्ण तिहि देरा दीया, झलकइ कळस सोना रा तिहा।
सहु कटक ऊतारा लीया, पाखळि सातपुड़ा गढ कीया॥
पातिसाह दल दीठउ जिसइ, गढना लोक चिंतवइ तिसइ।
गढ ऊपाड़ी पाड़िसी, कोसीसा उतारसी॥
गढ माहे हूयउ बूंबाकार, सूरज तणी न लाधीसार।
काळा कोट हाथिया तणा, गढ ऊपहरा दीसइ घणा॥
लोक सहू तिहि करइ विलाप, घणा देवला मांडइ जाप।
राय हमीर चिंत नवि धरइ, लोक सहू नइ सुसता करइ॥
कटक सहु मेल्हाणे दुवउ, खेहाडंबर भाजी गयउ।
दिस निर्मला भागउ अन्धार, ऊग्यउ सूर न लागी वार॥
लोक नउ भउ भाजी गयउ, कटक नहीं ए अचरिज भयउ।
लोकानइ उपनउ उच्छाह, पुनिहि उपरि हुवउ भाव॥
घणइ हरखि ऊग्यउ श्री सूर, तउ गढ मांहि बाज्या रिणतूर।
राय हमीर वधावउ करइ, पातसाह देखी गोइरइ॥
आज अम्हारउ जिव्यउ प्रमा, हुं भलइ ऊपनउ चहुआण।
रिणथंभवरि हउ होवइ राय, मुझ घरि ढीली आव्यउ पतिसाह॥
वस्तु
ताम राजा ताम राजा धरियउ उछाह।
गढ गाढउ सिंणगारीउ भला सुभट नइ ग्रास अप्पइ।
हरख धरी हम्मीरदे घणउ मान मीरा समप्पइ।
मुझ गढ भलइज प्राहुणउ आव्यउ अलावदीन।
सफल दिवस हुउ मुझ तणउ जन्म आज धन धन्न॥
चउपइ
रणथंभोरि गुड़ी उछली कोसीसइ भली।
तोरण ऊभवीया घर-बारि, मंगला (दियइ) चारि दियइ वर-नारि॥
च्यारि पोलि सिंणगारी तिहा, आरीसारा तोरण जिहा।
ऊभ्या धइवड़ चींध पताक, गुहिरा बाजइ त्रंबक ढाक॥
बुरिज बुरिज धरइ नीसाण, ढोल (तणइ) घाइ पड़इ अरि प्राण।
वाजइ वरगू नइ काहली, देव सहु जोवा आव्या मिली॥
सात छत्र धरावइ सीस, चमर ढळइ (ऊंचइ) रणथंभोरा ईस।
पटहस्ती बयठउ चहुआण, नगर मांहि फिरि कीयो मंडाण॥
दूहा
आलम साह आव्या भणी, कीधा बहुत उछाह।
गढ गाढउ सिंणगारीउ, रिणथंभोरइ नाह॥
हमीरदे मनि हरखीया, दळ देखी सुरताण।
आपणपउ धन मानतउ, बंदिण द्यइ अति दान॥
बंदीजण आसीस द्यइ, जइति हुवउ चहुआण।
न्हांता वाल रखे खिसइ, त हम्मीरदे राण॥
नगर लोक सहु मिल्या, वध्धावइ चहुआण।
गढ वधावइ अति घणउ, भरि भरि अंखिअयाण॥