गाथा

अवगति परगट आजुं, कोड्यां तारंण काजुं।
महि मडंण महाराजुं, सोह सांम्य सुभ राजुं॥

सोह सांम्य तुझि सुभ राजुं, जिण पथरि जळ क जीपाजुं।
लोप्य समंद लंकागढ लाजुं, मेल्य रीछ रावंण राजुं॥

छंद त्रिभंगी

देवजी रावंण का राजुं लोपंण लाजुं, क जंण पाजुं बल्य छलणौं।
कवि सारंण काजुं तो सुभ राजुं, आप अकळ अवरां कळणौं।
आदेस अभेव अछेव अगोचरि, अंनंत कोड़ि सिध उधरणौं।
झंभेसर जती जती झंभेसर, सति नारायंण तो सरणौ॥

सामी तुं सायर जल सोधंण, सुर परमोधंण, सख विरोधंण।
सम्भाळ भगवांन भुपालुं दया पालुं, गोरख गोम्यंद गोपालुं।
विवरस्य गुंण वेद गुंण्य स वाखंण्य स त्रिभुवंण इह नीस्य तारंण तरणौं।
झंभेसर जती जती झंभेसर, सति नारायंण तो सरंणौं॥

वुधर तु विध्य जांण विचखंण, वीर विचखंण पिंगल भाखंण पर लंहणौ।
मैणारंभ मथंण काली नथंण, रिण कंवरी भव्य धंन्य रहंणौ।
वीनवौ विसंन विध्य विध्य वौहारंण, भगत उधारंण भव हरंणौ।
झंपेसर जती जती झंपेसर, सति नारायंण तो सरंणौ॥

इबक तीह लासुं संभरथळय वासुं, लील विलासुं अहं अभेवासुं उदासुं।
पूगी मन्य आसुं महि कंवळासुं, होयसी वासुं हरि पासुं।
गुरु करिसी वासुं तोरा दासुं, तव तेज तारंण तरंणौ।
झंभेसर जती जती झंभेसर, सति नारायंण तो सरंणौ॥

कवत

तव तेज तो सरंण्य, असर रावंण उथपंण।
तव तेज तो सरंण्य, लंक बोहभीषंण थपंण।
तव तेज तो सरंण्य, अनंत भगतां सिध अपंण।
तव तेज तो सरंण्य, वार धंन विप्रत अपंण।
मंन सुध्य भाव मंन महंमहंण, तव तेज तारंण तरंण।
भव आंण्य उंण्य अनेक भव, संम्रथ झांभाजी तो सरंण्य॥

गाथा

दत विरंत गुपत दियतुं, आदि विसंन प्रवत प्रवतुं।
से नर सुगुर सलांम करतुं, नेहवाच नीहचळ नीज भगतुं॥

छंद

नेह वाच नीहचळ नीज भगतां निकासल नीरता, च्यारि वेद मुख पाटै चवै।
अंजण नहीं अज्या धरंम अगंज्या, राज निरंजंण तैंण रवै।
सांस है दोस सुरता सुगीयानी, इंण्य जुगति संसार तरै।
कर जोड़ि तुझि आगळि करणीगर, साध असा सलांभ करै॥

साचा सुचीयारा सती संतोषी, भगत जके भावीक भला।
ग्यानी नीजपात सुगंण सतवादी, वेद विचखंण वाट चला।
पूजै हरि पिंड पाखांण न पूजै, असत न भाखै अजर जरै।
कर जोड़ि तुझि आगळि करणीगर, साध असा सलांम करै॥

नीरमळ नीपाप नीकेवळ नीरता, नीज भगतानी नीज नांव लीयै।
सरब गुर सील सती संतोषी, दीन अंछना फळ असा दीयै।
उचर एक एक इक मंना, ध्यान नबी जो मंन धरै।
कर जोड़ि तुझि आगळि करणीगर, साध असा सलांम करै॥

सुगंण सुपात सुजीव सुकरती, सदा सुचील सीनान सझै।
सुध्रम साध सदा संतोषी, व्रत साचौ रहमांण भजै।
मिलै अलाह लहै एक मंनां, ध्रम नंवो उनंमनी धरै।
कर जोड़ि तुझि आगळि करणीगर, साध असा सलांम करै॥

कवत

पांच सात नव बार, कोड़ि तेतीस कहावै।
सील सत संग्रहै, असत ढुकड़ न आवै।
पूजै नहीं पाखांण, पुंहच्य सार पिंड पूजै।
काया अंतर काल, झुझता सरसा झूझै।
उचरै अनंत इह नीस्य अलख, ध्यांन नबी जो मंन धरै।
कर जोड़ि तुझि सारंगधर, कह तेज सै जग तरै॥

गाथा

व्यतर भूत करै वखांणौ, आदि विसंन न जपै अयांणौ।
सुर परहरि मिलिया सैतांणौ, पत्रियल पूजै पाखांणौ॥

छंद

पूजै पाखांण पूछै प्रोहित, भूला तके तीरथ भुंवै।
अजंण नहीं अंज्या अपंणी अभगता, काया नै खोजै घणौं क्रवै।
छलीया सैतांन्य सांच न सांच न हीवै, कूड़ कपट घंण घंण घंणौ कहै।
अवतारि अचंभ झंभाथळि आयौ, लिखीय न प्रापति केम लहै॥

कटक ते थूल कुचील करोधी, करनी भूला कलह करै।
अभगत के असर उपाधी, फेरा लाख असंख फिरै।
विमर तंन व्रहंम न खोजै, नह क्रंम थीया सीला वहै।
अवतारि अचंभ झंभाथळि आयौ, लिखीय न प्रापति केम लहै॥

ब्राह्मांण गुरु सकल ध्रंम वतावै, कैहत दे दे धरम कहै।
करै कलोभ अक्रंम कमावै, वैहता भव सागर वहै।
क्रियाहीण क्रतब का काचा, दुत अंनेरा जीव दहै।
अवतारि अचंभ झंभाथळि आयौ, लिखीय न प्रापति केम लहै॥

जोड़ै सिर जटा भसंम घटि भुंजवै, ध्यांन अंनेरा मंनै धरै।
स्रवंण मास्य कौ क्रद करि सांह, क्रंम कसाइयां तंणौ करै।
वेसास न वसत न खप वैकुंठै, कहैंण्य कुंमारग तंणौ वहै।
अवतारि अचंभ झंभाथळि आयौ, लिखीय न प्रापति केम लहै॥

कवत

लिखी न प्रापति केम, गोम्यंद का जस न गावै।
लिखी न प्रापति केम, वितर भूतां मंन लावै।
लिखी न प्रापति केम, वाट दोरै की बहिस्यैं।
लिखी न प्रापति केम, दुख दोरै का सहिस्यै।
भूख दुख दोर दुकट, पसळाद तंणी वाटै वहै।
अवतारि अचंभ झंभाथळि आयौ, लिखीय न प्रापति केम लहै॥

दूहो

सांम्य जप्यां सुख सपनुं, जग मां सुख न जांण्य।
हिरदै तेजा हेज करि, विसंनौ विसंन वखांण्य॥

छंद

विसंन विसंन भंण्य विसंन वखांणी, अवगति साधां उधरणौं।
दिवला स दानुं मदसु दांनु खाफर खांनुं खै गुवंणौं।
चेतो चित जांणी सारंगपाणी, नादे वेदे निज रहंणौ।
आयो गुर झंप अचंभ अजूंनी संभू, मया रूपी महंमहंणौ॥

सांमी तूं दांणौ वंस दळंण, छळंण सही सबळा।
आप अकळ अवरां कळंणौ, अजर अमर विपरति गति विगति।
सत सुकरत दाखंण सुवल, विसंन अंनहत व्रत।
भुदुं क्रत भार छोलवंण, संम्रत नर निकलंकी नारायणौ॥

नवीयां नवखण्ड च्यारे चक चक्रत, जंगळ जती जमाति जुड़ै।
घटीयौ सैतांन जागते घटि घटि, पाप दिसा भंगांण पड़ै।
दुल दुल तुरी अवल्य दीवांणी, लखीयौ तास कहा लखंणौ।
आयो गुर झंभ अचंभ अजूंनी संभू, मया रूपी महंमहंणौ॥

सुरपति सुरतांण सुगर सुथापंण, सदा संतोषी दांन सती।
नह क्रम निज नांव काम निज करणी, मिळै जमाति सही जती।
संभरथळि सुथळि जगत गुर पूरौ, अवगति पुरेष असरि वहंणौ।
आयो गुर झंभ अचंभ अजूंनी संभू, मया रूपी महंमहंणौ॥

कवत

तव न कोड़ि तेतीस, कर आगळि जोड़ै कर।
इकवीसवैं व्रह्ंमंडि, धरयौ सिर मेघाडम्बर।
धरंणि सेस सिंणगार, सुरनाथ सीसीहर।
चड़यौ सांम्य सिधकार, अैसो वौपार विसंभर।
कव तेज पयंपै जोड़ि कर, आसा पूरंण अभमंण।
भगवान भगति भव भंज्यवा, मिल्यौ महळि छ महंमहंण॥

रसंण्य तंत झंणकारम् ताळ भोगळ तंमक तुर।
तवंन तूर ततहै, घंट रंणकै घंण घुघर।
झुंणै वेद जोतगी, हुवै सेवगां सुंणौ सुर।
पड़ै भुंय पात्यगां, गुड़ै नीसांण गहर सुर।
कव तेज पयंपै जोड़ि कर, कवत गीत भाखंत गुण।
भगवान भगति भव भंज्यवा, मिल्यौ महळि छ महंमहंण॥

महळि धंन्य महंमहंण, महळि जिण्य भगत मंनावै।
महळि धंन्य महंमहंण, पाप प्राछीत खण्डावै।
महळि धंन्य महंमहंण, जीव तां जोख्यंम जावै।
महळि धंन्य महंमहंण, पिसंण को प्रांण नथावै।
महळि धंन्य महंमहंण, दुख दाळयद नहीं दीसै।
महळि धंन्य महंमहंण, रीप का कोप न रीसै।
महळि धंन्य महंमहंण, सुकवि तेज भाखंत सिरि।
प्रमोध्य रीध पहे आंणियां, ग्यान सुध्य गोमिंद हरि॥

जिसी चाल चालवै, चाल पंण्य तैसी चालूं।
जिसा बोल बोलवै, बोल पंण्य तैसा बोलूं।
जिसा मारग तूं मेलै, जीव तीण्य मारग जावै।
सरस तुझि संम्रथ, प्रांण प्रांणियो न थावै।
वीनती विसंन वाचा अचळ, सुणौ साम्य सेवग कहै।
महंमहांण मंन मांहरो मुकंद, तूं राखै तैसूं रहै॥

जीवलो भवजाळि में, पड़ि प्रल मुंनि संग्रहि।
विसंन विंसन वखांण्य, रहंण करि इहा साथेर रहि।
छोडि पाप संताप, आप उबारि अैसी परि।
न भूल्यसी न भावसी, न क्यौ भेळा विस भीतरि।
भाखंत सति आदित भगति, कव तेज सुवचन सुसरि।
मं भूल्य मंन मत मानीयो, कवत कहत मत मं करि॥

हरि हरि करंनै सींवरियौ, करंनै भुंय दीध कंवारी।
हरि जाच्यौ पहळाद, दीध घर सुत भंडारी।
दीध बभीछंण दांन, लंक सोवंन सींणगारी।
आप दांन अनंत, मंन वंछी सो मुरारी।
दावो त देव दातार गुर, अबीड़ अच्छ उचारौ।
वीनव तेज ना विसारीयो, कहीयौ करो कविसरौ॥

सुमेर संम वड, मिनख लोभ खंडाए।
पेट काजि पुनवंत, बोहत छंदा बोलाए।
जो जीभे जगंनाथ, विण अपरठो कथावे।
गीत कवत छंद ग्यांन, सरस सरळ सुर गावे।
वीनती विसंन वाचा अचळ, सुणो सांम्य सारंगधर।
उचरे तेज तीह वारनी, राख्य राज्य गुर सधर॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
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