दूहा

हाहाकार हुवो घणो, अमरकंका नगरी मांय।

राजधानी पड़ी भागी बिखरी, देखी नें डरप्यो राय॥

हिवे पदमनाभ राजा मन चिंतवे, हूं जीवां बचूं किण ठाम।

जो शरणे जावूं द्रोपदी तणे, तो कृष्ण ले म्हारो नाम॥

इम विचारने नीकल्यो, ओर कोई साथ।

शरणे आयो द्रोपदी तणे, बोल्यो जोड़ी हाथ॥

तुझ शरणे हूं आवियो, इम बोल्यो राजान।

जब द्रोपदी राजा नें कहे, ते सुणो सुरत दे कान॥

चौपाई

हिवे द्रोपदी कहे सुण राय, आय वणी ताहरे जी।

थे मोटो करे अन्याय, शरणे आया मांहरे जी॥

कृष्णजी तीन खंड रा नाथ, त्याने तें खिजाविया जी।

थारी अकाले करवा घात, सताब सूं आविया जी॥

तो शूर वीर बलवंत, प्राक्रम त्यारों अति घणो जी।

त्यां कीधो वेर्‌या नो अंत, साहमा मंड्या तिण तणो जी॥

त्यानें पाछा भागण रो नेम, विरुद लियां वहे जी।

जो उवे आधो काढे एम, तो मरजाद में कुण रहे जी॥

जो तूं जीवणो वांछे राजान, केई दिन ताहरो जी।

तो तूं छोड़ दे निज अभिमान, कह्यो कर माहरो जी॥

तो तूं अस्त्री वेश बणाय, पहर नारी वेस नें जी।

वले दाढी मूंछ मुंडाय, दूरा कर केश ने जी॥

स्नान करे सुध न्हाय, दूरा मेल टाल टाल ने जी।

वले पहरण भीनी साड़ी ल्याय, नीचा छेहड़ा राळ नें जी॥

काजळ घाल आंख्यां मांय, टीकी दे निलाड़ नें जी।

वले नाक में नथ लटकाय, गळे पहर हार ने जी॥

दोनूं बांहां में चुड़लो घाल, कचु पहर ने आण ने जी।

वले अस्त्री नी पर चाल, घूंघट नीचो ताण ने जी॥

भेंटणो वहु मोळो वखाण, तिणसू भर थाळ ने जी।

वले मोनें ले आगेवाण, गर्व थारो गाळ नें जी॥

वले घणा अतेवर मांहि, परवार सूं जाय नें जी।

इम वादे कृष्णजी रा पाय, अपराध खमाय नें जी॥

वले कहिजे तूं जोड़ी हाथ, भूंडो काम म्हे कियो जी।

हिवे जीवां वचूं किरपानाथ, शरणो तुझ में लियो जी॥

जो इसड़ी कहे करे नरमाय, तो जीवा वचे सही जी।

ते पिण अस्त्री वेस वणाय, तो कृष्ण मारे नहीं जी॥

त्रिय वेस वड़ा टबा मांहि, प्रतख ही पेखियो जी।

तेहनें अनुसारे ताहि, वर्णन त्रिया नों कियो जी॥

दूहा

वचन सुणे द्रोपदी तणो, पदमनाभ राजान।

पछे द्रोपदी कह्यो तिमहिज कर्‌यो, मेले निज अभिमान॥

अस्त्री रूप वणाय ने, अतेवर ले साथ।

शरणे आयो श्रीकृष्ण रे, बोलियो जोड़ी हाथ॥

हूं बल प्राक्रम देख तुम तणो, रिधि देख पाम्यो अगाध।

हिवे वारूंवार खमजो तुमे, म्हारो कियो अपराध॥

पगां लागो श्रीकृष्ण रे, सूंपी द्रोपदी ने आण।

जब कृष्णजी पदमोत्तर भणी, करड़ी बोल्या वाण॥

रे अपत्थ पत्थिया पापीया, द्रोपदी मांहरी वेन।

इणने थें आणी जाण नें, तो किण विध पामसी चेन॥

हिवे जीवतो जा तूं इहां थकी, भय मत पाम लिगार।

इम कही पदमोत्तर भणी, सीख दीधी तिणवार॥

चौपाई

हिवे पाछा वल्या श्रीकृष्णजी रे, द्रोपदी ने लेई साथ।

पांचूं पांडवा ने आणी द्रोपदी रे, सूंपी हाथो हाथ॥

पांडवां देखी द्रोपदी भणी जी, मन माहे हर्ष अपार।

हिवे पांच पांडव छठा कृष्णजी रे, वेठा रथ मंझार॥

जंबू द्वीप रा भरत ने जी, नीकल्या जीते राड़।

लवण समुद्र विचे थई जी, चाल्या कृष्ण मुरार॥

तिण काले ने तिण समे जी, घातकी खंड द्वीप रे माहि।

पूर्व अर्द्ध भरत मंझे जी, चंपा नगरी ताहि॥

पूर्णभद्र नामे वाग थो जी, छहुं रितु में सुखदाय।

तिहा तीन खंड केरो अधिपति जी, राय लखण गुण तिण मांय॥

तिण काले नें तिण समें जी, मुनि सुव्रत अरिहंत।

ते तीर्थंकर बावीसमां जी, तिहां आया विहार करत॥

चंपानगरी रा वाग में जी, समोसर्‌या भगवान।

धर्म कथा तिहां सांभळे जी, तीन खंड रो राजान॥

धर्म कथा सुणतां थकां जी, संख शब्द सुणियो ताम।

जाणे दूजो वासुदेव ऊपनी जी, भय पाम्यो तिण ठाम॥

जब मुनि सुव्रत स्वामी कहे जी, सुण कपिल वासुदेव राय।

थें जाण्यो इहां कोई ऊपनों जी, दूजो वासुदेव आय॥

तीर्थंकर चक्रवर्ती मोटका जी, वासुदेव बलदेव जाण।

एक खेतर में एक एक ऊपजे जी, दोय दोय उपजे आण॥

जंबू द्वीप रा भरत में जी, हथणापुर नगर मंझार।

तिहा पांच पांडव नी भारज्या जी, द्रोपदी नामे नार॥

अमरकंका नगरी तणो जी, पदमोत्तर नामें राय।

तिण द्रोपदी ने आणी इहाजी, मंत्री देव बोलाय॥

तिणसूं पांच पांडव ने कृष्णजी रे, आया तिणरी वाहार।

संग्राम कियो तिण अवसरे जी, संख पूर्‌यो तिणवार॥

मुनिसुव्रत स्वामी ने वादने जी, प्रश्न पूछे तिणवार।

तो हूं जाय मिलूं हिवे तेहसूं जी, निजरां देखूं कृष्ण मुरार॥

तीर्थंकर तीर्थंकर मिले नहीं जी, चक्रवर्ती सूं चक्रवर्ती नाहिं।

वासुदेव मिले वासुदेव सूं जी, नहीं मिले बलदेव माहोमांहि॥

धवळी पीळी ध्वजा रथ तेहनीजी, मांहे बेठा कृष्ण मुरार।

ते ध्वजा देखसी उण रथ तणी, लवण समुद्र मंझार॥

दूहा

वंदना कर हस्ती चढ़्यो, सुण अरिहंत री वाण।

लवण समुद्र नी वेल छे, तिहां ऊभो सताव सूं आण॥

कृष्ण वासुदेव तेहनीं, ध्वजा रथ री देख।

लवण समुद्र मांहे जावतां, तिणसूं हरखित हुवो वशेख॥

उत्तम पुरुष मो सरिखो, कृष्ण वासुदेव राय।

लवण समुद्र मांहे थई, जबूं द्वीपे उतावळो जाय॥

जब संख पचायण पूरियो, ते सांभळयो कृष्ण महाराय।

त्यां पिण पाछो संख पुरियो, कीधो घणी नरराय॥

सखे संख मिलिया तिहां, दोनूं वासुदेव राय।

हेत जुगत मनवारां करी, ते संख शब्द रे मांय॥

चौपाई

हिवे कपिल वासुदेव राजान, कृष्णजी ने देई सनमान।

अमरकंका राजधानी जठे, सबळो साथ ले आयो तठे॥

अमरकंका विखरी तिणवार, भागा तोरण पोल ले किंवाड़।

राजधानी विदरूप वशेख, गढ़ कोट किल्ला घर पड़िया देख॥

कपिल वासुदेव पूछे एम, राजधानी विखरी कहो केम।

भागा तोरण पोल किंवाड़, गढ़ कोट किल्ला रे पडिया वघार॥

जब पदमनाभ राय बोल्यो आम, सांभळो तीन खंड केरा स्वाम।

जंबू भरत रो कृष्ण वासुदेव, ते जुद्ध करण आयो स्वयंमेव॥

उण थांरी काण राखी कांय, तिणरे राज लेवण री थी मन मांय।

म्हे जुद्ध करने दियो भगाय, ताप पड़ि तिणसूं पाछा जाय॥

म्हें तिणसूं जुद्ध कियो तिण काल, आमां साहमां वूहा गोळा नाळ।

गढ कोट किल्ला पड़िया तिणवार, भागा तोरण पोल किवाड़॥

इम झूठ बोल्यो पदमोत्तर राय, ते कपिल वासुदेव सुणियो ताय।

तिण ऊपर कोप चढ्या तिणवार, करड़ा वचन कह्‌या निराधार॥

रे अपत्थ पत्थिया मूढ़ गिंवार, अकाले मरण रा वाछणहार।

मुझ सारिखा पुरुष कृष्ण राजान, त्यांसूं जुद्ध कियो धरमान॥

त्यां तोने दियो तुरत हठाय, तूं भाग ने आयो नगरी मांय।

थारी ध्वजा पताका लीधी लूट, तूं मो आगे काय बोले झूठ॥

घणो निभ्रंछी पाड़ी माम, वले देसोटो दियो तिण ठाम।

जिहां जिहां वरते म्हारी आण, त्यां तूं कठेई रहिजे जाण॥

हिवे पदमनाभ रो पुत्र बोलाय, तिणने राज वेसाण्यो ताय।

ते कपिल वासुदेव स्वयंमेव आप, अमरकंका रो राजा थाप॥

तिहांथी चाल आया निज ठाम, सुखे राज करे अभिराम।

हिवे जादवराय श्री कृष्ण मुरार, पिण समुद्र उतरिया पार॥

दूहा

हिवे पांचूंई पांडवा भणी, कहे कृष्ण आम।

थें जावो गंगा नदी ऊतरो, सुखे करो विश्राम॥

हूं लवण सुठिया देवता कन्हे, सीख मांगे ने तिण पास।

बात करनें आऊं वेगसूं, थे मत होवजो उदास॥

पांडव तिहांथी नीकल्या, आया गंगा नदी रे मंझार।

एक नावा मिली तिणमें वेसने, पांडव उतरिया पार॥

गंगा नदी उतर पांडवां, तिहां विचार कियो मन मान।

नावा मत मेलो श्रीकृष्ण नें, किसड़ाएक बलवान॥

गंगा नदी भुजा करे ऊतरे, एहवा बलवंत छे के नाहिं।

पारखा करण श्रीकृष्ण री, एहवी धार बेठा मन माहिं॥

चौपाई

देवता सूं हो मिलने श्री कृष्ण महाराज, सीख मांगेनें तिहाथी चालियाजी।

गंगा नदी हो वहे घणी ओगाज, तिणरा कांठा ताई आया रथ चालियाजी॥

नदी माहे हो नहीं कोई रथ रो काम, जब नावां नें जोवण लागा जादवपतिजी।

चिहूं दिशि जोया हो नावां नहीं दीठी ताम, वले नावां देखी नदी मांहे आवतिजी॥

जब जादवपति हो रथ नें घोड़ा सारथी सहीत, एक भुजा सूं त्यांने झालियाजी।

एक भुजा सूं हो तिरीया जाए डर भय रहीत, गंगा नदी मांहे आघा चालियाजी॥

मध्य भागे हो आया गंगा नदी रे मांय, तिहां थाका अंतत परसेवे भीना घणाजी।

जब चिंतवे हो मन में श्रीकृष्ण महाराय, अति बलवंता पांडव पांचूं जणाजी॥

ते भुजा कर हो उतरिया गंगा नदी रे पूर, हूं थाको पाणी में बळ चाले नहीं जी।

इम चितवंतां हो गंगा देवी आई हजूर, तिण पाणी रो थाग देवी सहीजी॥

तिहां मुहुर्त मात्र हो जदुपति ले विश्राम, पछे गंगा उतर कुसले खेमे आवियाजी।

पांच पांडव हो सुखे बेठा छे तिण ठाम, तिहां कृष्णजी आय तिणनें सरावियाजी॥

श्रीपति बोल्या हो पांडवा थें तो अति बलवान, थें भुजा करे नदी उतर ने आवियाजी।

भगाया हा थांने तिहां पदमनाभ राजान, जब तो थें वचन मांहें छळावियाजी॥

जब पांडव हो कहे सांभळ कृष्ण महाराय, म्हे नावां सूं नदी उतर आया इहांजी।

ते नावां नें हो साहमी नहीं मेली ताय, म्हे पांचूई मिलनें विचार कियो तिहांजी॥

गंदा नदी हो साढा बासठ जोजन मांहि, चोड़ी ओगाज करती वहे सहीजी।

ते कृष्णजी हो भुजा कर उतरे के नांहि, एहवो वल प्राक्रम छे के यांमे नहीं जी॥

वचन सुणनें हो तीन लीटी चाढ़ी निलाड़, कृष्णजी कोप चढ़े रोस आणियोजी।

थे पांचूंई पांडव पूरा मूढ़ गिंवार, अजेस म्हारो बळ प्राक्रम जाणियोजी॥

लवण समुद्र हो उतावळ सूं वेग उलांग, पदमोत्तर नें हठाय मान भंग करीजी।

अमरकंका हो म्हे तो मार विखेरी भांग, म्हे द्रोपदी आणनें थां आगळ धरीजी॥

थे तो भागा हो छोडेआया द्रोपदी री आस, जब विलखो वेदळ मुख जाण्यों म्है थाहरो जी।

ते म्हे आणी हो सूंपी द्रोपदी तुम पास, जब थें जाण्यों बळ प्राक्रम माहरोजी॥

दूहा

वले करड़ा वचन कहे कृष्णजी, कोप चढ्या अति पूर।

लोह डंडा लेई हाथ में, पांचूं रथ किया चकचूर॥

वले देसोटो दियो कृष्णजी, पांचूं पांडवा नें ताम।

जिहां आण वरते छे मांहरी, थें मत रहिज्यो तिण ठाम॥

पांचूं रथ भांग्या पांडवां तणा, नगर वसायो तिण ठाम।

तिहां लोकां जावाने थापियो, भागीरथ तीरथ नाम॥

हिवे तिहांथी निकल श्रीकृष्णजी, आया कटक उतरियो तिण ठाम।

पछे सेना सहित परवर् या थका, आया द्वारिका नगरी ताम॥

पांडव हथणापुर आविया, ले पोता रो साथ।

पडू राजा कन्हे आयनें, बोल्या जोड़ी हाथ॥

म्हानें देसोटो दियो कृष्णजी, वले कीधा आग्या वार।

म्हांसूं करड़ी कीधी कृष्णजी, देसोटो दे इणवार॥

चौपाई

हिवे पूछे पंडूराय, देसोटो थाने क्यूं दियो जी।

इसड़ो कवण अन्याय, मोटो खून थें कियो जी॥

जब पांडव बोल्या तिणवार, म्हे द्रोपदी ल्याविया जी।

समुद्र उतरिया पार, कुसळे खेमे आविया जी॥

जब कह्‌यो कृष्णजी मांय, गंगा उतरो तिहां जी।

थें चालो आण हुलास, हूंतो रहिसूं इहां जी॥

हूं सीख ले देवता पास, वेगो आऊं तिहां जी।

थें चालो आण हुलास, हूं रहिसूं इहां जी॥

जब म्हे आया गंगा समभाव, नावां सूं उतर जिहां जी।

म्हें साहमी मेली नाव, विचार कियो तिहां जी॥

कृष्ण बलवंत छे के नांहिं, नावां बिन ऊतरे जी।

इण गंगा नदी रे मांहि, भुजा करनें तिरे जी॥

पछे कृष्ण भुजा रे जोर, गंगा तिर आविया जी।

म्हे बेठा छा तिण ठोड़, म्हांनें त्यां सराविया जी॥

म्हांनें कृष्णजी कह्‌यो आय, बलवंत पांचूं जणा जी।

भुजा सूं नदी तिर बेठा आय, म्हे तो थाका घणा जी॥

जब म्हे कह्‌यो नावा सूं ताम, तिरनें इहां आविया जी।

थारो वळ जोवा रे काम, नावां नहीं ल्याविया जी॥

जब कोप्या कृष्ण मुरार, निलाड़ सळ चाढ़ने जी।

वळे म्हांने दीधी धिक्कार, करड़ा वयण काढनें जी॥

पूर्व बीती बात साख्यात, मांडे तात ने कही जी।

जाव देसोटा लग बात, सुणाय दीधी सहीजी॥

जब पंडू राजा कहे आम, अकारज थे कियो जी।

अविनो करे तिण ठाम, देसोटो थें लियो जी॥

थांसूं किया गुण अनेक, भाई हित जाणनें जी।

त्यांरो करे हासो ठेक, त्यांसूं तोड़ी ताणनें जी॥

ओलंभा दिया पडूराय, पांचूं पांडवां भणीजी।

हिवे रहो किसी ठोड़ जाय, कृष्ण तीन खंड घणी जी॥

जब बोल्या पांडव पांचूं माय, होणहार टळे नहीं जी।

हिवे करवो कवण उपाय, विचार करो सही जी॥

स्रोत
  • पोथी : भिक्षु ग्रंथ रत्नाकर भाग 2 ,
  • सिरजक : आचार्य भिक्षु ,
  • संपादक : आचार्य तुलसी, श्रीचंद रामपुरिया ,
  • प्रकाशक : जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा, कलकत्ता ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै