चउपइ

रणथंभवर गढ मेर समाण, राज करइ हमीरदे चिहुयाण।

पुहवी इंद्र कहीजइ सोइ, इंद्र सभा हम्मीरां होइ॥

तिणि नयरी ना विसमा घाट, वावि सरोवर नय वलि हाट।

गिरि गरुय ब्रिक्ष्य आराम, रूअड़ा तिणि नयरी अभिराम॥

वाड़ी वृख्य नहीं कामणा, अंब जंबीरज केतकि तणा।

जाई वेउल चंपक महमहइ, देखी नगर लोक गहगहइ॥

कोटि जिसो हुवइ इंद्र विमाण, च्यारि पोलि तिणि कोटि प्रधान।

पोलि चंडि नवलखीज होइ, चउरासी चहुटा नितु जोइ॥

बाण्या बंभण निवसइ घणा, लाख एक छइ हाटा तणा।

बर्णावर्ण लोक तिहं बहू, जाति प्रजा निवसइ छइ सहू॥

सिखरबद्ध दस सहस प्रसाद, ऊंचा सुरगिरि स्युं लइ वाद।

सोवन कलस दंड झलहलइ, ऊपरि थकी धजा लहलहइ॥

दानसाल तिणि नगरी घणी, कोटीध्वज विवहार्‌या तणी।

बंभण वेद भणइ सुविचार, बंदीजण नितु करै कइ वार॥

तिणि नयरी ऊछब अपार, मंगल च्यारि दीयइ वर नारि।

जती ब्रती तिह निवसइ घणा, तपी तपोधन नहि कामणा॥

गढ मढ मंदिर पोलि पगार, वास नयर नव जोयण वार।

चंपक वरण सरीसा गात्र, धारू वारू बे छइ पात्र॥

घणउं वखाण किसु हिव करउ, अलकावती नी ऊपम धरउ।

तिणि नयरी विलास अपार, वेस वसइ सहस दस वार॥

त्रैलोक्यमंदिर राय आवास, सीला ऊन्हा धवलहर पासि।

भूखी पोलि अछइ तिणि कोटि, रिण नइ थंभ विचइ छइ त्रोटि॥

चहुयाण जयतिंगदे पुत्र, राज करै सहु आणी सूत्र।

बालउ राजा बइठउ राजु, बंधव वीरमदे जुवराजु॥

सवा लाख साहण दलधणी, ऊलग करइ मोडोधा धणी।

गयवर घरि गुडइ सइ पंच, घोड़ा सहस एक सइ पंच॥

सवा लाख साहण दल मिलइ, त्रिणि लाख पायल दल भिलइ।

सात छत्र धरावइ सीस, सवा लाख संभरि नउ ईस॥

जे कुलवंत भला छइ सूर, तिहनइ द्यइ ग्रास तणा सवि पूर।

वेला आई सारइ काम, तिहनइ कदे नहीं अपमान॥

ते नवि कीणही करइ जुहार, घरि बइठा खाई भंडार।

झूझ मांहि ते गिणइ आढ, करतारा स्युं मांडइ वाढ॥

रिण खाखर पाखर घरि घणी, सवि सामहणी सुहड़ा तणी।

अंगा टोप रिगावलि तणा, पार लाभइ घरि छइ घणा॥

संग्रहणी कीधा कोठार, धान तणा मोटा अंबार।

घीव तेल री वावड़ि जिसी, जीमता नहीं कदे खूटिसी॥

मोटा राय तणी कूंयरी, परणी पांचसइ अंतेउरी।

रूपि करी नइ अति अभिराम, पटराणी हांसलदे नाम॥

वरागणा सहस इक जाणि, कर्दप तणी जिसी हुइ खाणि।

दासी सहस पंचसै घरइं, सवि छारूप तिहां संचरइ॥

द्रव्य तणी नहीं कामणा, सहस पंच मण सोना तणा।

बहत्तर कोड़ि गरथ घरि होइ, पाखर पार जाणइ कोइ॥

सूर्य वंसि माहिं चंद्र समान, रणमल रायपाल बेऊ प्रधान।

अरधी बुंदी त्यानइ ग्रास, घणउ परिवार अछइ तिहि पासि॥

अति दाता सरणाई सोई, रिणि अभंग सो राजा होई।

करइ कोई अन्याई रीति, राज करइ पूरबली रीति॥

सूर वीर बहुत गुण धीर, वहय वीरमदे राय हमीर।

खत्रीवट खड़ग तणइ परमाणि, राज करइ रणथंभि चहुवाण॥

मोटउ राइ राजि विधि बहु, तिणि थानकि निवसइ छइ सहु।

करइ लील लोकातिहां सदा, तिणि नगरी दुख नहीं एकदा॥

चतुरंग लिखिमी निवसइ तिहां, दुख नहीं तिहि नयरी किहां।

डंड डोर नवि लीजइ माल, तिणि नयरी दुख नहीं रसाल॥

तिणि अवसरि उलगाना बेउ, रिणथंभोरि तिह पहुता बेउ।

महिमासाहि गाभरू मीरि, ते आव्या संभल्या हमीरि॥

तिहि मीरा नउ वड़ो प्रमाण, चूकइ नहीं ते मेल्हइ बाण।

तिहरा प्राक्रम पार को लहइ, खड़ग छत्रीसी नी उपम वहइ॥

सवा लाखरी सिंगणि धरइ, जोड़ मोल कुणही नवि करइ।

तीर लहइ सहस दीनार, मेल्हइ तीर जाइ घर बारि॥

सरि लागाइ मरइ जइ कोई, सर ना मोल परोजन होई।

घाइल हुइ लहै सर सोई, पछि पीड़ा तिणि पाटउ होई॥

बेऊ सूर नइ बेऊ रणधीर, अति दाता महिमासाइ मीर।

वाड़ी मांहि उतारा कीया, खाण खाय ते ससुता हुआ॥

गढ ऊपरि मोकळी अरदासि, बेऊ मीर आव्या तुम्ह पासि।

मोटो राव सुणी रणथंभि, म्हे आव्या थारइ उठंभि॥

मनमांहि चमक्यउ राउ चहुआण, भला सूर बेऊ पठाण।

ते लेवा मोकल्या प्रधान, राय हमीर दीयइ बहु मान॥

चरणे लागि रह्या सिरनामि, देइ बांह ऊठाड्या ताम।

तुम्ह प्राक्रम अम्हे संभल्या, भलु हुवउ ते दरसण मिल्या॥

दूहा

राय कहइ कारणि कवणि, आव्या एणइ ठामि।

कइ सुरताणि जि मोकल्या, कइ तुम्हि घर कइ कामि॥

सुरताणि जि मोकल्या, म्हे घर कइ कामि।

कटक विणास घणउ करी, सरणइ आव्या सामि॥

घणा देस अम्हे फिर्या, राखण कोइ समत्थ।

सवालाख संभरि धणी, भंजि अम्हारी अवत्थ॥

अलुखान जि मंगियउ, अम्ह तीरइ पंचाध।

घणा दिवस म्हे ऊलग्या, जेऊ दीधउ आध॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीरायण ,
  • सिरजक : भांडउ व्यास ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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