तरवर फल पर कारणै आपु न एकु न खंति।
बिढ़नी सापुरिसाह की पर उपगारहि हुंति॥
तरवर सफल फलंति तासु फल तरवर चक्खै।
सरवर जल गंभीर तासु जल सरवर रक्खै॥
रयण दीपि बहु रयण तासु गह गहै रहंतौ।
मुत्याहल साइ रहै तासु सायर पहरंतौ॥
दुख सहै आपु मनहरु कहत लोभ लगत नवि संचरै।
सापुरिस विढंती लच्छि मणि हो पर उपगारहं विस्तरै॥