निजु ब्रत कारण जानकी दस सिर हथु न दिन्ह।
रघु हथु हियड़ा मांहि जपि राख्यौ सील रतन्न॥
निजु सीलह व्रत मित्त जाणि यहु दुक्खणि रोहणु।
इह भय जस विस्तरण अवर भय सुख परोहण॥
राम धरणि किणि सुणी जेण रावण जस मोड़िउ।
आपु पवित्त करेवि उभय कुल कलस चहोड़िउ॥
भंजिउ न सील रघु हियै धरि भान मुगति निर्म्मल गुणी।
जग मांहि अजउं जगमगि रही हो सील लीक सीता तणी॥