सिद्ध बड़ो जोगेंद्र, देख राजा चित हरस्यौ,

ज्यूं सरोज सर मांझि, सूर देखत ही विकस्यौ।

भगत-भाव बहु करी, जुगत कर जोग संतोख्यौ,

निसा बैठ नृप पासि, पत्र पंचामृत पोख्यौ।

संतुष्ट होइ रावल कहै, माग जु तुझ, कछु चाहिये,

राजा रतनसेन चहुवांण कह, इक पदमण मोहि व्याहिये॥

स्रोत
  • पोथी : पद्मिनी चरित्र चौपाई ,
  • सिरजक : जटमल नाहर ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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