रूपवंत रतिरंभ, कमल जिम काय सकोमल।
परिमल पुहप सुगंध, भमर बहु भमें विलावल।
चंप कली जिम चंग, रंग गति गयंद समांणी।
ससि वदनी सुकमाल, मधुर मुख जंपे वाणी॥
चंचल चपल चकोर जिम, नयण कंत सोहें घणी।
कहें राघव सुलतान सुण, पुहवी इसी व्हें पदमणी॥