मेह कइ कारण मोर लवइ फुंनि मोर की वेदन मेह न जाणइ।
दीपक देखि पतंग जरइ अंगि सो बहू दुख चित्त मइ नांणइ।
मीन मरइं जल कंइज विछोहत मोह धरइ तनु प्रेम पिछाणइ।
पीर दुखी की सुखी कहां जाणत, सयण सुणइ ‘जसराज’ बखाणइ॥