मेह कइ कारण मोर लवइ फुंनि मोर की वेदन मेह जाणइ।

दीपक देखि पतंग जरइ अंगि सो बहू दुख चित्त मइ नांणइ।

मीन मरइं जल कंइज विछोहत मोह धरइ तनु प्रेम पिछाणइ।

पीर दुखी की सुखी कहां जाणत, सयण सुणइ ‘जसराज’ बखाणइ॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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