लूटि चोरि धनु लेत हो सो सबु देखत जाइ।

कर्म्म सिला चंप्यो सही दै खिण पाउ उठाइ॥

लुटि चोरि धनु लेतु सुतो धनु सुरधनु जेहा।

जहि जुव्वणमति भुल्ल सुतो जुव्वण जल रेहा॥

जिहि तन पोष करंति सुतो तन अंतक भावै।

जिहिं पिय पुत्तहं प्रेम सपिय सब रहन पावै॥

तिसवि भविक मे मे करत कर्म्म सिला चंप्यो सही।

श्री मानु कहै मति अग्गलौ हो देखिण पाव उठावही॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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