कुच युग कठिण सरूप, रूप अति रूड़ी रांमा।
हसत वदन हित हेज, सेझ नित रमें सुकांमा।
रूसें त्रूसें रंग, संग सुख अधिक उपावें।
राग रंग छत्तीस, गीत गुण ग्यांन सुणावें॥
सनान मंजन तंबोल सुं, रहे असोनिस रागणी।
कहें राघव सुलतांन सुण पुहवी इसी व्हें पदमणी॥