कहै ताम जोगेंद्र, दीप सिंघल पदमावत,

राज पाट तजि चलौ, भूप ! जे तुझ मन भावत।

कहै राय, करि कृपा, वेग यहु कारज कीजै,

जो कुछ कहो सो नाथ, साथ सामग्री लीजै।

मृग त्वचा बिछाई सिद्ध तब, पढ़ो मंत्र तब बैठ करि,

उड़ गये सिंघलद्वीपकों, राजा रतनसेन जोगेंद्र वरि॥

स्रोत
  • पोथी : पद्मिनी चरित्र चौपाई ,
  • सिरजक : जटमल नाहर ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै