वीज जेम झलकंत, कांति कुंदण जिम सोहें।
सुरनर गुण गंधर्व, रूप तृभुवन मन मोहें।
त्रिवली, मयतन लंक, वंक नहु वयण पयंपें।
पति सुं प्रेम अपार, अवर सुं जीह न जंपें॥
सांम धरम ससनेहणी, अति सुकमाल सोहांमणी।
कहें राघव सुलतान सुण, पुहवी इसी हें पदमणी॥