दर्प्पण में धन देखि करि मूरिख लेण कहंति।

पुत्त कळत्तह राचि करि कहि किम मुगति लहंति॥

दर्प्पण में धन देखि लोभ करि हथ जु घले।

विजुळ कै चमकारि कज सिरि पंथह चलै॥

सुपिनै राज लहेवि जागि करि मुत्थहं बाहै।

पुत्त कळत्तह राचि मुकति घर अंगणि चाहै॥

बिनु ज्ञान ध्यान विण तेज विणु विण संजमु विण सुद्ध मति।

श्री मानु कहै मति अगलौ ही क्यों पावै दुर्लभ मुकति॥

स्रोत
  • पोथी : मरु-भारती ,
  • सिरजक : जैन कवि मान ,
  • संपादक : डॉ. कन्हैयालाल सहल ,
  • प्रकाशक : बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी ,
  • संस्करण : अक्टूबर
जुड़्योड़ा विसै