सरवर जल तरु छांहड़ी, सगौ जु भंजै भीड़।

सजण सोई सराहीयै, जाणै सुख दुख पीड़।

जाणै सुख दुख पीड़, नहीं सो सज्जण केहौ।

सो सरवर किणि काम, नीर ग्रीषम दै छेहो॥

तरवर झड़ि मुड़ि जाउ, पंथि छाया नहु रंजै।

सोई सयण अकयत्थ, भीड़ जौ किमही भंजै॥

दिल कूड़ सयण सरबर निजळ, तरु छाया विण परिहरौ।

जसराज भीड़ि भजै नहीं, सगौ तिकौ किण कामरौ॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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