नयन कुं देखी नाहिं, कानन कुं सुनी नांहि,
अैसी बनाय कहै, सुणी हुं खीजिये।
जाकै मेलि मति गति, अति है कठोर चित्त,
क्रोधन को गेह तासु, कवल न पतीजिऐ।
सुनो मेरे यार, ‘जिनहरष’ कहै विचार,
अैसो दुर्जन ताको, कारो मुंह कीजिये॥