फिर्यौ ताम सुलतांन, प्रोळ पहिली जब आयौ,
रतनसेन भयो साथ, लाख बकसीस दिवायौ।
चल्यौ तांम सुलतान, प्रोळ दूजी जब आयौ,
और दिये दस गड्ढ़, राय अति बहुत लोभायौ।
इम लेवै बगसीस, तबह कपट कर फंदियो,
राजा रतनसेन अति लोभकर, ग्रहि सुलतान सुबंधीयो॥