सरवर एहु सरीर जिहिं णव णाल वहंत।
हंस सु निर्मल ज्ञानमय कहि क्यउ सुख लहंति॥
तरुवरु तनु सरु रोम मंस जिहं कद्दमि मत्तो।
सोणित सुज्झर नीर नाल नव द्वार बहंतो॥
काम लहरि पसरंत व्याधि जलचर जु रहंता।
मसा जाल कज्झिय अधिक कहै मान गंभीर दुख।
एहि सरीर सरवरि वसिवि हो हंसं तिहां किम लहइ सुख॥