ठूंड ऊभौ तावड़ै

बळेड़ै रो के बळै

आज गळै

भलांई काल गळै

दिमकां बीनै रोज तळै।

अेक सोन चिड़ी

बैठी सीसड़ै

बोली—कठै गई थारी डाळियां?

कठै रुळिया थारा पानड़ा?

कुण देंवतो पड़ूत्तर

ठूंड कठै सुणै?

उदास घास-सी

होगी मौन बा ताक्यो इन्नै-बिन्नै

उड़गी फेर फुर्र सूं।

पण

खुड़खुड़ खातीड़ो

रोज आ'कै सांझ-सबेरै

कर-कर कोचरा

काढ़ै दीमकां-कीड़ा

जीमै धापगै मोकळा

पण ठूंड

ना रोवै

ना बोलै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मुखराम मांकड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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