ठूंड ऊभौ तावड़ै
बळेड़ै रो के बळै
आज गळै
भलांई काल गळै
दिमकां बीनै रोज तळै।
अेक सोन चिड़ी
आ बैठी सीसड़ै
बोली—कठै गई थारी डाळियां?
कठै रुळिया थारा पानड़ा?
कुण देंवतो पड़ूत्तर
ठूंड कठै सुणै?
उदास घास-सी
होगी मौन बा ताक्यो इन्नै-बिन्नै
उड़गी फेर फुर्र सूं।
पण
खुड़खुड़ खातीड़ो
रोज आ'कै सांझ-सबेरै
कर-कर कोचरा
काढ़ै दीमकां-कीड़ा
जीमै धापगै मोकळा
पण ठूंड
ना रोवै
ना बोलै।