आपां
बंट्या हां टुकड़ा में
हर टुकड़ो तलवार सूंत्या
स्व की रिछ्या खातर,
ईं ओसाण चूक टेम में
कदै दिख जावै झरोखां स्यूं झांकतो
मुट्ठी भर आभौ
कदै बड़ जावै जाळी में
कोई भूली भटकी किरण
या कदै भींट जावै सैलानी
पवन को झोंको
आकर दरूजै सै
जणा जलम जावै
कदै कोई अेक अधूरी कविता।