घर सूं निकळ्यां फेर,

जमानै री दुतकार सूं

घबराकै,

मत आज्याये पाछो घरां,

क्षितिज नै भींट्यां बिना।

पाळ राखिये

मनङा रा कुणा मैं

आस किरण रो छोटो

सो टुकङो।

छिन-बिन हुई सकै पांखङा,

टूट सकै साँस,

तड़फङावण काया री रुक्यां बी

जगमगावै लो जीव,

आसकिरण सूं।।

स्रोत
  • सिरजक : सुनीता बिश्नोलिया
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