सुणो हो के!

गमला में साग उगै

कांच में माणखो

यो विग्यान

आपां नै

कठै ले ज्यावैगो।

स्याणी!

अपणायत पांगळी होयां

सै क्यूं ओछो होज्या

इब तो खाणो भी

कैपसूलां में आवैगो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवतीप्रसाद चौधरी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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