सुणी है गांव-शहरां में

आ’ग्या जंगळी जिनावर खूंखार

आं री आंख्यां रैवै है हळ दांईं

पण, पंजां स्यूं फाड़ दे है मिनखां नै।

बतावै है लोग

अै जंगळ स्यूं कोनी आया

कोई सरकस हाळा को फिरग्यो माथो

पैली तो पाळ्यां आनैं

अब छोड दिया म्हारै कानी,

बा सोवै है सुख की नींद

मैं कदैई कोनी सोयो

तो सोवणियां नै किकर सोवण द्‌यूं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम अटल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 12
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