म्हे बी लिखता गीत सलोणा,

हांसी री कविता

पण म्हारी तो घर वाळी नटगी।

बोली—यो रामार्‌यो के धंधो पकड़्यो,

लिख-लिख कागद फाड़ो

होठां-ईं-होठां में बोलो,

ज्यूं देर्‌यां हो राकसियै को झाड़ो॥

कदै'क मूंड पकड़ कर बैठो,

कदै'क जोर-जोर सूं बोलो।

कदै'क बंद कलम कर मेलो,

कदै'क बेगा-बेगा खोलो॥

कदै'क आंख्यां भर ल्यावो,

कदै'क मुळको कदै'क हांसो।

कदे'क लटकाय थोबड़ो अइंयां बैठो,

ज्यूं दुनियां भर को सांसो॥

पड़ी-पड़ी चा ठंडी होज्या,

बैठ्या-बैठ्या सोवो।

बिन पीयोड़ी बीड़ी बुझज्या,

आंधां ज्यूं माचिस टोवो॥

कदै या बी सोची कै!

मायकै सूं ल्यायोड़ी साडी, लीर-लीर व्है फटगी।

म्हे बी लिखता गीत सलोणां, हांसी री कविता

पण म्हारी तो घर वाळी नटगी॥

थे गीत लिखो इतणै

मुंसी लिख दे सैंकडा अरजी।

पाटो पीढ़ी खाती घड़ दे

नो दस कमीज सीमदे दरजी॥

अर कापी भरो इतणै तो

अेक चेजारो पूरी हेली चिण दे।

घणी बातां में के पड़्यो है,

भली-सी लुगाई दो टाबर जण दे॥

और लिख्यां सूं के पूरा पड़गा,

फेर छपावण को सांसो।

छप के रैज्या बिना बिकी

तो पड़्या खाट में खांसो॥

पण मैं के लागूं थारी

मेरी बात झैरसी लागै।

बाबलियै तकदीर फोड़दी,

करके थारै सागै॥

हाथ जोड़ समझावण लाग्यो।

दे धक्को लैरने हटगी।

म्हे बी लिखता गीत सलूणा हांसी री कविता।

पण म्हारी तो घर हाली नटगी॥

और लिख्योड़ी थारी कवितावां

कैं-कैं कै गुण कर दीन्यूं?

कैं कै घर में घी का चास्या?

कैं को दुख हर लीन्यू?

थे गीत लिखो या दूहा

मनै राड़ नै आगै करल्यो।

कदै'क सौ हाथ जमी में गाडो

कदै'क ठाय अकासां घरद्‌यो॥

थे लिख दी—

घर वाळी बेलण की मारी

पण सांची सांच बताओ।

थारै बदन में लागी कद थी

जद बेलण लैर बगायो॥

बदनाम करो तो कर द्‌यो

मैं तो मां कै रै ल्यूंगी।

थे खसम कल्पना का बण ज्यावो

मैं तो दुहागो सै ल्यूंगी॥

म्हारै गांव को बिसाती आयो लो

बैंकै साथ चली जाती

पण देख टींगरा डटगी।

म्हे बी लिखता गीत सलूणा हांसी री कविता।

पण म्हारी तो घर वाळी नटगी॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : महावीर जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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