ओळभो!

कीकर देवांला?

देवांला किणनै ओळभो?

पाव री ठौड़!

पंसेरी रो घाव!

कर रैया हो डाव ऊपर डाव

साव साचाणी

बळियोड़ै मूंडै

कीकर देवांला फूंक

अपरोगा लाग रैया है

सारा उणियारा।

मनरळी री बातां

घातां री घाणमथाण में

अळी-गळी होयगी है

रड़कै है सिळी मन में

तूटगी आसंग तन री

क्यूं कै

बीतगी बातां

रातां रै बालै

घातां में घुळगी अपणायत

पीढ्यां री!

आप देखी हो?

कुदाव में पड़गी प्रीत

पांगरण सूं पैला ई!

लांबोड़ै हेलै

ओछोड़ी विरकां

उल्टी पढ लीनी पाटी

कदै सोच्यो है?

ताटी रै ताण

कीकर रुकैला

भार भींतां रो!

नीं समझणियै मीतां रो

किणनै देवांला ओळभो?

अेकर सोचजो आप

जाप उल्टा जपियां

पार नीं पड़ सकैला

थांनै ठाह है

कै

बिल में बड़ती वेळा

फणधारी नै होवणो पड़ै है

साव पाधरो

थै तो बटबटीजो हो!

बांटो हो किड़किड़ी

चिड़चिड़ी आदत रै पाण।

चिड़बोथिया कर सको हो

पण किणनै देवांला ओळभो

आंपा तो भलपण

हियै रो हेत

अर अंतस अपणायत रो

कर चूका ऊजमणो

ठंडी वारां में

पछै किण बात रो ओळभो

अर किणनै ओळभो।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणयोड़ी ,
  • सिरजक : गिरधर दान दासोड़ी