मिनखां रै जंगल मांय

रैंवता-रैंवता

मिनख मांय

निवड़ग्यौ मिनखपणौ

अर डरपीजग्यौ

खुदौ खुद सूं।

मिनख कुहावणौ

अर मिनख होवणौ

न्यारी न्यारी बातां है।

आज रै मिनख नै

नीं है दरकार

आंन, बांन, स्यांन

अर मांन री

बदलतै संदरभ मांय

मिनखपणै खातर अबै

जरूत नीं

मिनख नै

ब'डौ आदमी

बणनै खातर

चाइजै

अब

कुरसी अर मोटी तिजोरी

नीं जणा

मिनख ही अर मिनखपणौ

सगळा ई/इयां ईं बाजै मिनख।

स्रोत
  • पोथी : अंवेर ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर ,
  • संस्करण : पहला संस्करण